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भारत–अमेरिका व्यापार ढांचे से हिमालयी सेब किसानों में बेचैनी, सस्ते आयात का डर

Himalayan apple farmers uneasy over India-US trade framework, fearing cheap imports

श्रीनगर: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर हिमालयी राज्यों के सेब उत्पादकों में चिंता गहराने लगी है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के किसान संगठनों को आशंका है कि यदि अमेरिकी सेबों के आयात पर शुल्क में ढील दी गई, तो घरेलू सेब बाजार पर इसका गंभीर असर पड़ेगा। किसानों का कहना है कि सस्ते आयात से उनकी उपज की कीमतें गिरेंगी और पहले से संकट झेल रहा सेब उद्योग और कमजोर हो जाएगा।

किसान संगठनों ने उठाए सवाल

संयुक्त किसान मंच से जुड़े नेताओं ने इस संभावित समझौते पर कड़ा विरोध जताया है। मंच के संयोजक हरीश चौहान ने कहा कि सेब क्षेत्र पहले ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों का दबाव झेल रहा है। यूरोपीय संघ और न्यूजीलैंड के साथ हुए समझौतों के चलते आयात शुल्क में पहले ही कटौती की जा चुकी है, जिससे विदेशी सेब भारतीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ते हो गए हैं। अब अमेरिका से आयात की आशंका ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

आयात शुल्क घटा तो बढ़ेगा मूल्य दबाव

किसान नेताओं का कहना है कि यदि आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 20–25 प्रतिशत तक किया गया, तो विदेशी सेब भारतीय मंडियों में काफी कम कीमत पर उपलब्ध होंगे। इससे घरेलू सेब की मांग और कीमत दोनों प्रभावित होंगी। किसानों का दावा है कि अमेरिकी और न्यूजीलैंड के सेब 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक सस्ते बिक सकते हैं, जिससे स्थानीय उत्पादकों को सीधा नुकसान होगा।

प्रीमियम भारतीय सेब पर खतरा

किसान संगठनों के अनुसार, फिलहाल आयातित अमेरिकी सेब एक बॉक्स में ऊंची कीमत पर बिकते हैं, लेकिन शुल्क कम होने के बाद यही सेब ज्यादा प्रतिस्पर्धी दाम पर बाजार में आ सकते हैं। इसका सीधा असर भारत के प्रीमियम सेबों पर पड़ेगा, जिनकी कीमतें घटाने के लिए किसानों को मजबूर होना पड़ सकता है। इससे उनकी उत्पादन लागत निकल पाना भी मुश्किल हो जाएगा।

सेब उद्योग से जुड़ी है लाखों की आजीविका

भारत में सेब उत्पादन करीब 25 लाख टन के आसपास है, जिसमें सबसे बड़ा योगदान जम्मू-कश्मीर का है। यह उद्योग हजारों करोड़ रुपये का कारोबार करता है और लाखों परिवारों की रोजी-रोटी इसी पर निर्भर है। पहाड़ी क्षेत्रों में सेब की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है।

जलवायु परिवर्तन से पहले ही दबाव में किसान

कश्मीर घाटी के कई सेब उत्पादक पहले ही मौसम की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। कम बर्फबारी, असमय बारिश, कीट प्रकोप और बढ़ती लागत ने किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर कर दी है। ऐसे में सस्ते आयातित सेब उनके लिए नया संकट बन सकते हैं।

सरकारी आश्वासन पर भरोसा कम

हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि व्यापार समझौते में किसानों के हितों की अनदेखी नहीं की जाएगी, लेकिन किसान संगठनों का मानना है कि जब तक सेब जैसे संवेदनशील उत्पादों को स्पष्ट संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक खतरा बना रहेगा। किसानों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आयात शुल्क बढ़ाने और घरेलू उत्पादकों की सुरक्षा की मांग की है।

नीतिगत फैसलों पर टिकी नजर

फिलहाल व्यापार वार्ताएं जारी हैं, लेकिन हिमालयी राज्यों के सेब किसानों की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। उनका कहना है कि समय रहते सुरक्षा उपाय नहीं अपनाए गए, तो सेब उद्योग का भविष्य अनिश्चित हो सकता है।

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