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चीन सीमा से सटे उत्तराखंड के गांवों में बदल रही तस्वीर, पारंपरिक घरों से बढ़ेगा पर्यटन और रोजगार

The landscape of Uttarakhand's villages bordering China is transforming, traditional homes set to boost tourism and employment

Vibrant Villages: उत्तराखंड के चीन सीमा से सटे सीमांत गांवों में अब विकास की नई तस्वीर दिखाई देने लगी है। वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत इन इलाकों में बुनियादी सुविधाओं के साथ पर्यटन, एडवेंचर और स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। इसी कड़ी में पारंपरिक पहाड़ी शैली में तैयार किए जा रहे घर अब आकार लेने लगे हैं।

इन भवनों में स्थानीय पत्थरों और लकड़ी की नक्काशी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनका उद्देश्य सिर्फ पुराने गांवों को नया रूप देना नहीं है। इनके जरिए सीमांत क्षेत्रों में पर्यटकों के लिए ठहरने की सुविधा बढ़ाने और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर तैयार करने की कोशिश भी की जा रही है।

तीन जिलों के 51 गांवों पर फोकस

उत्तराखंड पर्यटन विभाग के अनुसार वाइब्रेंट विलेज योजना के पहले चरण में उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ के 51 सीमांत गांवों को शामिल किया गया है। इन गांवों में सड़क, संचार, बिजली और आजीविका से जुड़ी सुविधाओं को मजबूत करने पर काम किया जा रहा है।

पर्यटन विभाग की योजनाओं में सीमांत क्षेत्रों को पर्यटन और एडवेंचर गतिविधियों से जोड़ने पर भी जोर है। उत्तराखंड पर्यटन की नीतियों में ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने का प्रावधान भी है।

171 करोड़ रुपये की योजनाओं से बदलेगा सीमांत क्षेत्र

पर्यटन विभाग की ओर से वाइब्रेंट विलेज क्षेत्रों में करीब 171 करोड़ रुपये की विकास योजनाएं संचालित किए जाने की जानकारी दी गई है। उत्तरकाशी के नेलांग और जादूंग गांव में भी बड़े स्तर पर काम चल रहा है।

इन इलाकों का ऐतिहासिक महत्व भी है। नेलांग और जादूंग वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध से जुड़े रहे हैं। युद्ध के दौरान यहां के ग्रामीणों को अपने घर छोड़ने पड़े थे। इसके बाद लंबे समय तक ये क्षेत्र काफी हद तक वीरान रहे। अब इन गांवों को फिर से गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

जादूंग में पुराने घरों को मिल रहा नया रूप

उत्तरकाशी के जादूंग गांव में 23 पुराने क्षतिग्रस्त घरों का पारंपरिक पहाड़ी शैली में पुनर्निर्माण किया जा रहा है। इन घरों को उनके पुराने आधार पर तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

निर्माण में देवदार की लकड़ी और स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल हो रहा है। लकड़ी के खंभों पर नक्काशी की जा रही है। वहीं पत्थरों की पारंपरिक चिनाई इन भवनों को अलग पहचान दे रही है।

बताया गया है कि छह घरों का काम 90 प्रतिशत से अधिक पूरा हो चुका है। इन्हें आने वाले शीतकाल में ग्रामीणों और पर्यटकों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

होमस्टे और एडवेंचर का बनेगा आधार

इन पारंपरिक घरों को होमस्टे और डॉरमेट्री के रूप में इस्तेमाल किए जाने की योजना है। इससे पर्यटकों को सीमांत गांवों में रुकने की सुविधा मिल सकती है।

उत्तराखंड पर्यटन की होमस्टे नीति भी दूरस्थ इलाकों में आवासीय सुविधाएं बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने पर जोर देती है। ऐसे में जादूंग जैसे गांवों में पर्यटन गतिविधियां बढ़ने से स्थानीय युवाओं को गाइड, होमस्टे, ट्रेकिंग और अन्य सेवाओं में काम मिल सकता है।

माणा से लेकर नीती घाटी तक विकास

चमोली के माणा गांव में भी पर्यटन सुविधाओं को विकसित किया जा रहा है। यहां पार्किंग और टूरिस्ट इंफॉर्मेशन सेंटर जैसी सुविधाओं पर काम हुआ है। माणा से आगे गस्तोली क्षेत्र में सीमा दर्शन जैसी गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

नीती घाटी में टिम्मरसैंण को धार्मिक और साहसिक पर्यटन से जोड़ने की कोशिश हो रही है। वहीं पिथौरागढ़ की व्यास और दारमा घाटी में कम्युनिटी बेस्ड टूरिज्म और होमस्टे को बढ़ावा दिया जा रहा है।

सीमांत गांवों में रोजगार की उम्मीद

वाइब्रेंट विलेज योजना का एक बड़ा उद्देश्य सीमांत क्षेत्रों में स्थानीय आजीविका के अवसर बढ़ाना भी है। पर्यटन विभाग की योजनाओं में स्थानीय लोगों को पर्यटन गतिविधियों से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।

पारंपरिक घरों का निर्माण पूरा होने के बाद इनका इस्तेमाल पर्यटकों के ठहरने और एडवेंचर गतिविधियों के बेस के रूप में किया जा सकता है। इससे सीमांत गांवों की संस्कृति और वास्तुकला को भी पहचान मिलेगी।

इस तरह चीन सीमा से सटे उत्तराखंड के गांवों में विकास केवल सड़कों और भवनों तक सीमित नहीं रह रहा है। पर्यटन, स्थानीय संस्कृति और रोजगार को साथ जोड़कर इन इलाकों को नई पहचान देने की कोशिश की जा रही है।

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