Himalayan Monal Uttarakhand: पर्यटकों और वाहनों के शोर से बदल रही उत्तराखंड के राज्य पक्षी मोनाल की आवाज, वैज्ञानिकों की रिसर्च में बड़ा खुलासा
Himalayan Monal in Uttarakhand: Noise from tourists and vehicles is altering the call of the Monal Uttarakhand’s state bird reveals a significant finding from scientific research.
देहरादून, 3 नवंबर 2026: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती पर्यटकों की आवाजाही, वाहनों का शोर और तीर्थयात्रियों की गतिविधियां अब वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को भी प्रभावित कर सकती हैं। एक वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि उत्तराखंड का राज्य पक्षी हिमालयी मोनाल (Himalayan Monal) अधिक शोर वाले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत ऊंची आवृत्ति पर आवाज निकाल रहा है।
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने केदारनाथ कस्तूरी मृग अभयारण्य की दो घाटियों में मोनाल की आवाजों का अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने पाया कि अधिक मानवीय गतिविधियों वाले चोपता क्षेत्र में मोनाल की आवाज की प्रमुख आवृत्ति अपेक्षाकृत शांत मद्महेश्वर घाटी की तुलना में अधिक थी।
यह शोध बताता है कि प्राकृतिक वातावरण में बढ़ता शोर पक्षियों के संवाद करने के तरीके को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि आवाज में यह बदलाव पक्षियों के स्थायी जैविक विकास का प्रमाण नहीं है। इसे बदलते ध्वनि वातावरण के अनुरूप व्यवहार में लचीलेपन के रूप में देखा जा रहा है।
Himalayan Monal की आवाज में क्या बदलाव मिला?
हिमालयी मोनाल उत्तराखंड का राज्य पक्षी है। रंग-बिरंगे पंखों और आकर्षक बनावट के कारण यह हिमालयी वन्यजीवों की प्रमुख प्रजातियों में शामिल है।
लेकिन वैज्ञानिकों का ध्यान इस बार मोनाल के रंगों या उसके आवास पर नहीं, बल्कि उसकी आवाज पर केंद्रित था।
शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिक शोर वाले वातावरण में रहने वाले मोनाल अपेक्षाकृत ऊंची आवृत्ति पर आवाज निकालते हैं।
विशेष रूप से उनकी आवाज की पीक फ्रीक्वेंसी यानी प्रमुख आवृत्ति में अंतर दर्ज किया गया।
शोध में कुछ उच्च सांख्यिकीय स्तरों पर आवाज की अवधि में मामूली वृद्धि के संकेत भी मिले।
इससे यह संभावना सामने आती है कि पक्षी आसपास के शोर के बीच अपनी आवाज को दूसरे पक्षियों तक पहुंचाने के लिए ध्वनि संबंधी व्यवहार में बदलाव कर रहे हैं।
हालांकि, शोध से यह निश्चित रूप से सिद्ध नहीं हुआ है कि यह बदलाव उनके संचार को पूरी तरह सफल बना रहा है।
HNBGU के वैज्ञानिकों ने किया अध्ययन
यह शोध हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया है।
अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता हैं:
- राजीव लोचन
- दिनेश कुमार शर्मा
- आनंद कुमार
राजीव लोचन और दिनेश कुमार शर्मा विश्वविद्यालय के एसआरटी परिसर, बादशाहीथौल, टिहरी गढ़वाल से जुड़े हैं।
आनंद कुमार विश्वविद्यालय के श्रीनगर गढ़वाल परिसर से संबद्ध हैं।
शोध का शीर्षक Noise-induced vocal shifts in the Himalayan Monal (Lophophorus impejanus) vocal distribution in two different habitats है।
यह अध्ययन जुलाई 2025 में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ और अगस्त 2025 में वैज्ञानिक पत्रिका Behavioural Processes के खंड 230 में प्रकाशित हुआ।
नवंबर 2026 में सामने आई समाचार रिपोर्टों के कारण इस शोध के निष्कर्ष एक बार फिर चर्चा में हैं।
चोपता और मद्महेश्वर घाटी में हुआ तुलनात्मक अध्ययन
वैज्ञानिकों ने शोध के लिए केदारनाथ कस्तूरी मृग अभयारण्य के दो अलग-अलग क्षेत्रों का चयन किया।
पहला क्षेत्र मद्महेश्वर घाटी था, जहां अपेक्षाकृत कम मानवीय गतिविधियां होती हैं।
दूसरा क्षेत्र चोपता घाटी था, जो पर्यटन और तीर्थयात्रा की गतिविधियों के कारण अधिक व्यस्त रहता है।
चोपता क्षेत्र में सड़कों से गुजरने वाले वाहन, पर्यटक, ट्रेकर्स और तीर्थयात्री वातावरण में अतिरिक्त शोर उत्पन्न करते हैं।
इसके विपरीत मद्महेश्वर घाटी के अध्ययन क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम था।
दोनों स्थानों के ध्वनि वातावरण में अंतर ने वैज्ञानिकों को यह समझने का अवसर दिया कि शोर का मोनाल की आवाज पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
719 आवाजों की रिकॉर्डिंग से सामने आए परिणाम
वैज्ञानिकों ने अप्रैल 2023 से जून 2024 के बीच हिमालयी मोनाल की आवाजों की रिकॉर्डिंग की।
इसके लिए दिशात्मक माइक्रोफोन और AudioMoth जैसे ध्वनि रिकॉर्डिंग उपकरणों का उपयोग किया गया।
रिकॉर्डिंग विशेष रूप से सुबह और शाम के उन समयों में की गई, जब मोनाल अधिक सक्रिय रूप से आवाज निकालते हैं।
शोधकर्ताओं ने कुल 719 आवाजों का विश्लेषण किया।
अध्ययन में आवाज की आवृत्ति, अवधि और आसपास के शोर से संबंधित विभिन्न मापदंडों की तुलना की गई।
इसके लिए क्वांटाइल रिग्रेशन जैसी सांख्यिकीय पद्धति का उपयोग किया गया, जिससे आवाज की आवृत्ति के अलग-अलग स्तरों पर शोर के साथ संबंध को समझा जा सके।
परिणामों में अधिक शोर वाले क्षेत्र के मोनाल की प्रमुख आवाज आवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक पाई गई।
171 हर्ट्ज का अंतर क्यों महत्वपूर्ण है?
शोध से संबंधित विस्तृत रिपोर्टों के अनुसार, अपेक्षाकृत शांत और शोर वाले क्षेत्रों में मोनाल की प्रमुख आवाज आवृत्ति के मध्यिका स्तर पर लगभग 171 हर्ट्ज का अंतर दर्ज किया गया।
शांत क्षेत्र में रिकॉर्ड की गई आवाजों की प्रमुख आवृत्ति शोर वाले क्षेत्र की तुलना में लगभग 171 हर्ट्ज कम थी।
हर्ट्ज ध्वनि की आवृत्ति मापने की इकाई है।
अधिक आवृत्ति का संबंध सामान्यतः ध्वनि की ऊंची पिच से होता है।
इसलिए यह परिणाम संकेत देता है कि अधिक शोर वाले वातावरण में मोनाल अपनी आवाज की पिच बदल सकते हैं।
हालांकि, ऊंची आवृत्ति का अर्थ जरूरी नहीं कि पक्षी अधिक तेज आवाज में बोल रहा हो।
ध्वनि की पिच और उसकी तीव्रता अलग-अलग विशेषताएं हैं।
Acoustic Masking क्या है और पक्षियों पर इसका क्या असर होता है?
इस शोध को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अवधारणा है—एकॉस्टिक मास्किंग (Acoustic Masking)।
जब वातावरण में मौजूद शोर किसी पक्षी या जानवर की आवाज को ढक देता है, तो दूसरे जीवों के लिए उस आवाज को सुनना मुश्किल हो सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी शांत जंगल में पक्षी की आवाज दूर तक सुनाई दे सकती है।
लेकिन उसी स्थान पर वाहनों का लगातार शोर होने पर उसकी आवाज पहचानना कठिन हो सकता है।
ऐसी स्थिति में कुछ पक्षी अपनी आवाज की आवृत्ति, अवधि या अन्य विशेषताओं में बदलाव कर सकते हैं।
हिमालयी मोनाल के मामले में शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिक शोर वाले वातावरण में आवाज की प्रमुख आवृत्ति बढ़ने का संबंध दिखाई देता है।
यह बदलाव कम आवृत्ति वाले मानवीय शोर से बचकर संवाद बनाए रखने का संभावित तरीका हो सकता है।
क्या पर्यटकों का शोर मोनाल के प्रजनन को प्रभावित करेगा?
हिमालयी मोनाल अपनी आवाज का उपयोग दूसरे पक्षियों के साथ संवाद करने के लिए करता है।
इसमें प्रजनन संबंधी संकेत और सामाजिक संपर्क भी शामिल हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, नर मोनाल की आवाज मादा पक्षियों तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यदि आसपास का शोर आवाज को ढक देता है, तो संचार में बाधा उत्पन्न होने की संभावना रहती है।
लेकिन वैज्ञानिकों ने अभी यह स्थापित नहीं किया है कि आवाज की आवृत्ति में बदलाव से मोनाल की प्रजनन सफलता कम हुई है।
इसके अतिरिक्त इस अध्ययन से पक्षियों की मृत्यु दर या आबादी में गिरावट का प्रत्यक्ष प्रमाण भी नहीं मिला है।
इसलिए यह कहना कि पर्यटकों के शोर से मोनाल का प्रजनन प्रभावित हो चुका है, उपलब्ध निष्कर्षों से आगे का दावा होगा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस संबंध को समझने के लिए आगे अनुसंधान की आवश्यकता है।
क्या मोनाल की आवाज हमेशा के लिए बदल गई है?
इस अध्ययन के निष्कर्षों को लेकर एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
वैज्ञानिकों ने मोनाल की आवाज में अंतर दर्ज किया है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पक्षी की आवाज आनुवंशिक रूप से बदल गई है।
शोधकर्ता राजीव लोचन ने इस बदलाव को व्यवहारगत लचीलेपन से जोड़ा है।
इसका अर्थ है कि पक्षी आसपास की परिस्थितियों के अनुसार अपनी आवाज निकालने के तरीके में समायोजन कर सकता है।
ऐसा समायोजन स्थायी विकासवादी परिवर्तन से अलग है।
इसके लिए दीर्घकालिक अध्ययन आवश्यक होगा कि शोर घटने पर आवाज पहले जैसी होती है या नहीं और अलग-अलग पीढ़ियों में कोई स्थायी परिवर्तन दिखाई देता है या नहीं।
Uttarakhand State Bird Monal की क्या खासियत है?
हिमालयी मोनाल का वैज्ञानिक नाम Lophophorus impejanus है।
यह तीतर कुल का एक आकर्षक पक्षी है और उत्तराखंड का राज्य पक्षी होने के साथ नेपाल का राष्ट्रीय पक्षी भी है।
नर मोनाल अपने चमकदार हरे, नीले, बैंगनी और तांबे जैसे रंगों वाले पंखों के कारण विशेष पहचान रखता है।
मादा मोनाल का रंग अपेक्षाकृत हल्का और भूरा होता है, जो प्राकृतिक वातावरण में छिपने में सहायता कर सकता है।
यह पक्षी मुख्य रूप से हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है।
इसके आवास में ऊंचाई वाले वन, घास के मैदान और पर्वतीय ढलान शामिल हैं।
मोनाल सामान्यतः जमीन पर भोजन तलाशता है और वनस्पतियों तथा मिट्टी के भीतर उपलब्ध खाद्य पदार्थों का उपयोग करता है।
हिमालयी जैव विविधता में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
Climate Change से भी प्रभावित हो सकता है मोनाल का आवास
आवाज से संबंधित अध्ययन के अतिरिक्त शोधकर्ताओं ने हिमालयी मोनाल के आवास पर जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों का भी अध्ययन किया है।
Scientific Reports में प्रकाशित एक अलग शोध में प्रजाति के लिए उपयुक्त आवास का भविष्य के जलवायु परिदृश्यों के आधार पर आकलन किया गया।
इसमें तापमान, वर्षा और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया।
मॉडल के अनुसार, भविष्य में कुछ ऐसे क्षेत्र जो वर्तमान में मोनाल के लिए उपयुक्त हैं, बदलती जलवायु के कारण कम अनुकूल हो सकते हैं।
इसके साथ कुछ नए क्षेत्रों में उपयुक्त परिस्थितियां विकसित होने की संभावना भी हो सकती है।
लेकिन नए आवासों तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होगा।
सड़कों, निर्माण गतिविधियों और आवास के विखंडन के कारण वन्यजीवों के लिए विभिन्न क्षेत्रों के बीच आवाजाही कठिन हो सकती है।
यह निष्कर्ष भविष्य के संभावित जोखिमों से संबंधित है, न कि वर्ष 2100 तक होने वाले निश्चित नुकसान की भविष्यवाणी।
IUCN की सूची में मोनाल की क्या स्थिति है?
हिमालयी मोनाल को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में फिलहाल Least Concern यानी कम चिंता वाली श्रेणी में रखा गया है।
इसका अर्थ है कि वैश्विक स्तर पर यह प्रजाति वर्तमान में अत्यधिक संकटग्रस्त श्रेणियों में शामिल नहीं है।
हालांकि, किसी प्रजाति की वैश्विक संरक्षण स्थिति उसके प्रत्येक स्थानीय आवास की वास्तविक परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं दर्शाती।
किसी क्षेत्र में बढ़ता शोर, मानवीय गतिविधियां और आवास परिवर्तन स्थानीय पक्षियों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए वैज्ञानिकों के लिए प्रजाति की आबादी के साथ उसके प्राकृतिक व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण है।
पर्यटन स्थलों पर Noise Pollution कम करना क्यों जरूरी?
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम है।
लेकिन संवेदनशील वन्यजीव आवासों के आसपास अनियंत्रित शोर पर्यावरणीय चुनौती बन सकता है।
विशेष रूप से वाहनों के हॉर्न, तेज संगीत और अन्य मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न ध्वनि प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित कर सकती है।
वैज्ञानिकों के निष्कर्षों के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों में अनावश्यक शोर कम करने के उपाय उपयोगी हो सकते हैं।
इनमें वन्यजीव क्षेत्रों के पास हॉर्न का सीमित उपयोग, तेज संगीत पर नियंत्रण, पर्यटकों को जागरूक करना और ध्वनि स्तर की नियमित निगरानी जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।
हालांकि, किसी विशेष पर्यटन स्थल पर नए प्रतिबंध लागू करने का निर्णय संबंधित वन और प्रशासनिक अधिकारियों को वैज्ञानिक आकलन तथा लागू नियमों के आधार पर लेना होगा।
Himalayan Wildlife Conservation के लिए क्या संकेत देता है अध्ययन?
मोनाल की आवाज में दर्ज बदलाव यह संकेत देता है कि मानवीय गतिविधियों का प्रभाव केवल जंगलों की कटाई या वन्यजीवों के आवास में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप तक सीमित नहीं हो सकता।
ध्वनि वातावरण में परिवर्तन भी वन्यजीवों के व्यवहार से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू है।
यह विशेष रूप से उन प्रजातियों के लिए प्रासंगिक है जो संचार के लिए आवाजों पर निर्भर करती हैं।
अध्ययन में मोनाल की आवाज और शोर के बीच संबंध मिला है, लेकिन इसके दीर्घकालिक जैविक परिणाम अभी स्पष्ट नहीं हैं।
भविष्य के शोध में यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि आवाज में बदलाव पक्षियों के प्रजनन, सामाजिक व्यवहार और दीर्घकालिक अस्तित्व को किस हद तक प्रभावित करता है।
इसके अतिरिक्त अन्य हिमालयी पक्षियों पर भी इसी प्रकार के अध्ययन उपयोगी हो सकते हैं।
बढ़ता पर्यटन और बदलती मोनाल की आवाज: क्या है निष्कर्ष?
उत्तराखंड के राज्य पक्षी हिमालयी मोनाल पर हुआ यह वैज्ञानिक अध्ययन पर्वतीय पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन की आवश्यकता को सामने लाता है।
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 719 आवाजों का विश्लेषण करके पाया कि अधिक मानवीय शोर वाले चोपता क्षेत्र में मोनाल की आवाज की प्रमुख आवृत्ति शांत मद्महेश्वर घाटी की तुलना में अधिक थी।
यह परिणाम दर्शाता है कि पक्षी अपने आसपास के ध्वनि वातावरण के अनुसार संचार व्यवहार में बदलाव कर सकते हैं।
हालांकि, यह बदलाव स्थायी है या नहीं और इससे प्रजनन तथा जीवित रहने की क्षमता पर क्या असर पड़ता है, इसका पता लगाने के लिए आगे अध्ययन आवश्यक है।
यह शोध हिमालयी पर्यटन क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण की निगरानी और संवेदनशील वन्यजीव आवासों के संरक्षण पर अधिक ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित करता है।



