सरहद की हिफाजत करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले 19 कुमाऊं रेजिमेंट के लांस नायक विकास कुमार शुक्रवार, 3 अप्रैल को पंचतत्व में विलीन हो गए। पिथौरागढ़ के रामेश्वर घाट पर पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। शहीद के बड़े भाई नीरज ने उन्हें मुखाग्नि दी। Pithoragarh Soldier Vikas Kumar Martyrdom Sikkim Avalanche 2026 की यह घटना न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शहीद की अंतिम यात्रा में उमड़े जनसैलाब ने ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, विकास तेरा नाम रहेगा’ के नारों से आसमान गुंजा दिया।
ताबूत खुलते ही बिलख पड़ी पत्नी
शुक्रवार की सुबह जैसे ही सेना का विशेष वाहन शहीद विकास कुमार का पार्थिव शरीर लेकर उनके पैतृक गांव गणकोट (सुकौली) पहुंचा, पूरे गांव में कोहराम मच गया। सबसे हृदयविदारक दृश्य तब देखने को मिला जब विकास का पार्थिव शरीर घर के आंगन में रखा गया। पति का चेहरा देखते ही पत्नी प्रीति अपनी सुध-बुध खो बैठीं। सदमे में डूबी प्रीति बार-बार एक ही बात दोहरा रही थीं— “इन्हें अस्पताल लेकर चलते हैं, ये ठीक हो जाएंगे।” इस करुण दृश्य ने वहां मौजूद हजारों लोगों की आंखों को नम कर दिया। महिलाओं और परिजनों ने किसी तरह उन्हें संभाला, लेकिन शहीद की पत्नी का विलाप सुनकर हर पत्थर दिल भी पसीज गया।
सिक्किम में गश्त के दौरान आया था एवलॉन्च
महज 27 वर्ष की अल्पायु में वीरगति प्राप्त करने वाले लांस नायक विकास कुमार 29 मार्च को सिक्किम के दुर्गम इलाके में तैनात थे। ड्यूटी के दौरान वे अपने दो साथियों के साथ गश्त पर निकले थे, तभी अचानक आए एक भीषण हिमस्खलन (Avalanche) की चपेट में आ गए। हादसे में उनके दोनों साथी तो सुरक्षित बच गए, लेकिन विकास बर्फ के नीचे दब गए और मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हो गए। साल 2017 में भारतीय सेना में भर्ती हुए विकास अपनी कर्तव्यनिष्ठा और साहस के लिए जाने जाते थे।
8 माह के मासूम के सिर से उठा पिता का साया
विकास कुमार के निधन से एक हंसता-खेलता परिवार उजड़ गया है। साल 2023 में ही उनका विवाह प्रीति से हुआ था। उनके घर में 4 जून 2025 को बेटे ‘पृथ्विक’ का जन्म हुआ, जो अभी महज 8 महीने का है। विकास पिछले साल दिसंबर में छुट्टी पर घर आए थे और उन्होंने वादा किया था कि वे जून 2026 में बेटे के पहले जन्मदिन पर घर आएंगे। परिवार बेसब्री से जून का इंतजार कर रहा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अब पृथ्विक के पास अपने पिता की यादों के तौर पर केवल उनकी वर्दी और कुछ तस्वीरें बची हैं।
रामेश्वर घाट पर उमड़ा जनसैलाब
शहीद की अंतिम यात्रा में जिला प्रशासन के अधिकारियों समेत हजारों की संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए। पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगांई ने शहीद को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि विकास कुमार का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति के लिए प्रेरित करता रहेगा। शहीद के भाई नीरज ने भावुक होते हुए सरकार से मांग की कि गांव के स्कूल का नाम और मुख्य द्वार शहीद विकास कुमार के नाम पर रखा जाए ताकि उनका नाम इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो जाए।

