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ईरान-इजराइल संघर्ष से भारत के किसानों और फलों के व्यापारियों पर असर, कीमतों में उतार-चढ़ाव

Iran-Israel conflict impacts Indian farmers and fruit traders, causing price fluctuations

पुणे: ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष का असर अब ग्लोबल ट्रेड पर दिखाई देने लगा है। भारतीय किसानों और फल व्यापारियों को इसका सीधा वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है। रमजान के पवित्र महीने में खाड़ी देशों में फलों की मांग सामान्यतः अधिक रहती है, लेकिन इस बार युद्ध के कारण शिपमेंट में रुकावटें आई हैं।

सेब और अन्य फलों की आपूर्ति प्रभावित

ईरान से सेब का आयात रुक जाने से भारत में सेब की कीमतें 30 से 40 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गई हैं। वहीं, खाड़ी देशों में निर्यात होने वाले भारतीय फल बंदरगाह पर फंसे होने के कारण घरेलू बाज़ार में कीमतें गिर गई हैं। मुंबई पोर्ट पर केले और अंगूर के कई रेफ्रिजेरेटेड कंटेनर फंसे हुए हैं।

फल व्यापारियों का कहना है कि लगभग 250-300 कंटेनर केले के और 100 कंटेनर अंगूर के अभी शिप नहीं किए जा सके हैं। इसके अलावा, 350-400 सामान्य कंटेनर भी मुंबई पहुंच चुके हैं, लेकिन शिपिंग ऑपरेशन बंद होने के कारण इन्हें समय पर भेजा नहीं जा सकता। खाड़ी क्षेत्र में बंदरगाहों के कारण लगभग 500-600 कंटेनर फलों के अभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाए हैं।

आयात भी प्रभावित

ईरान से सेब, कीवी और खजूर के लगभग 800-900 कंटेनर ईरानी पोर्ट पर फंसे हुए हैं। प्रत्येक सेब और कीवी के कंटेनर में लगभग 23-24 टन फल-सब्जियां हैं, जिनकी कीमत 30-32 लाख रुपये बताई गई है। खजूर के एक कंटेनर की कीमत लगभग 45 लाख रुपये है।

किसानों और व्यापारियों की स्थिति

निर्यात होने वाले अधिकांश फलों जैसे केले, अंगूर और प्याज का उत्पादन महाराष्ट्र से होता है। शिपमेंट रुकने से राज्य के किसानों और व्यापारियों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। घरेलू बाज़ार में अधिक सप्लाई होने के कारण कीमतें नीचे आ गई हैं। शिपिंग पूरी तरह बंद होने की वजह से फंसे सामान को वापस भी नहीं किया जा सकता।

व्यापारियों की अपील

खाड़ी देशों में फलों के निर्यात में बाधा और आयात प्रभावित होने के चलते किसान और व्यापारी गंभीर वित्तीय संकट में फंसे हैं। व्यापारियों ने महाराष्ट्र सरकार से ठोस कदम उठाने और प्रभावित किसानों तथा व्यापारियों को मुआवजा देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय लड़ाई के कारण खेती-बाड़ी करने वाला समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर हो गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक राजनीतिक तनाव का असर सीधे कृषि और फलों के निर्यात पर पड़ रहा है, जिससे किसानों को अपने उत्पादों की उचित कीमत नहीं मिल पा रही। इसी कारण यह संकट किसानों और व्यापारियों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।

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