उत्तराखंड

Uttarakhand Glaciers Melting Rapidly: तेजी से पिघल रहे उत्तराखंड के ग्लेशियर, Nepal Disaster के बाद बढ़ी चिंता

Uttarakhand Glaciers Melting Rapidly: Uttarakhand's glaciers are melting fast; concerns have risen following the Nepal disaster.

Uttarakhand Glaciers Melting Rapidly: हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच उत्तराखंड के ग्लेशियरों को लेकर एक नई वैज्ञानिक चेतावनी सामने आई है। हालिया अध्ययनों में राज्य के कई ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने और बर्फ की मात्रा कम होने की जानकारी सामने आई है। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब अगस्त 2026 में नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने से विनाशकारी बाढ़ और मलबे का प्रवाह हुआ था।

वैज्ञानिकों के अनुसार, उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां भी हिमालय के उन हिस्सों जैसी हैं जहां हाल के वर्षों में ग्लेशियरों के पीछे हटने, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और ग्लेशियल झीलों के विस्तार जैसी घटनाएं देखी गई हैं। हालांकि, किसी एक आपदा को सीधे किसी एक ग्लेशियर के पिघलने से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से अलग अध्ययन का विषय है।

Uttarakhand Glaciers Melting Rapidly: 23 ग्लेशियरों के अध्ययन में सामने आई तेजी से पिघलने की तस्वीर

हालिया रिपोर्ट में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन का हवाला दिया गया है, जिसमें उत्तराखंड के 23 ग्लेशियरों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में ग्लेशियरों के पीछे हटने की दर अलग-अलग पाई गई, जिसमें उनकी ऊंचाई, ढलान, आकार और मलबे की परत जैसे भौगोलिक कारकों की भी भूमिका सामने आई।

रिपोर्ट के मुताबिक, शंकुलपा ग्लेशियर ने सात दशक के दौरान लगभग 518 मीटर पीछे हटने का रिकॉर्ड दर्ज किया। वहीं बंदरपूंछ, चोराबाड़ी, गंगोत्री, मिलम, पिंडारी और खतलिंग जैसे ग्लेशियरों में भी उल्लेखनीय बर्फ क्षरण और पीछे हटने की दर दर्ज की गई है।

Khatling और Milam Glacier पर विशेष चिंता

उत्तराखंड के प्रमुख ग्लेशियरों में खतलिंग और मिलम को लेकर वैज्ञानिक आंकड़े विशेष रूप से ध्यान खींचते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मिलम ग्लेशियर के पीछे हटने की दर अलग-अलग अध्ययन अवधियों में लगभग 32 से 37.8 मीटर प्रतिवर्ष तक दर्ज की गई।

वहीं टिहरी गढ़वाल की भिलंगना घाटी में स्थित खतलिंग ग्लेशियर के लिए हालिया शोध में 1973 से 2024 के बीच करीब 5.33 किलोमीटर पीछे हटने की बात सामने आई है। वैज्ञानिकों ने पाया कि 2014-2025 के दौरान खतलिंग और एक अन्य ग्लेशियर में बर्फ के नुकसान की दर 1973-2000 की तुलना में करीब चार से पांच गुना अधिक थी।

Uttarakhand Glaciers Melting Rapidly: भिलंगना घाटी में छह ग्लेशियरों पर हुआ अध्ययन

28 अगस्त 2026 को Regional Environmental Change में प्रकाशित अध्ययन में भिलंगना घाटी के छह ग्लेशियरों—खतलिंग, फातिंग, दुधगंगा, रतांगारियान, जोगिन और एक अनाम ग्लेशियर—का अध्ययन किया गया।

वैज्ञानिकों ने 1973 से 2025 तक के सैटेलाइट डेटा और डिजिटल एलिवेशन मॉडल का इस्तेमाल करके ग्लेशियरों की ऊंचाई, क्षेत्रफल, बर्फ के नुकसान और अग्रभाग यानी glacier front के पीछे हटने का विश्लेषण किया। अध्ययन में सभी छह ग्लेशियरों में लगातार बर्फ और द्रव्यमान के नुकसान की पुष्टि हुई।

ग्लेशियल झील के बढ़ने से GLOF का खतरा

वैज्ञानिकों की चिंता केवल ग्लेशियरों के पिघलने तक सीमित नहीं है। भिलंगना घाटी में एक ग्लेशियर के सामने बन रही झील का आकार भी बढ़ा है। अध्ययन के अनुसार, इस झील का क्षेत्रफल 2011 में करीब 0.23 वर्ग किलोमीटर था, जो 2024 तक बढ़कर लगभग 0.36 वर्ग किलोमीटर हो गया।

ऐसी झीलों के आकार में लगातार वृद्धि होने पर Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) का जोखिम बढ़ सकता है। GLOF की स्थिति में ग्लेशियल झील का पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है, जिससे नदी घाटियों में बसे गांवों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे को खतरा हो सकता है।

Uttarakhand Glaciers Melting Rapidly: नेपाल की आपदा ने बढ़ाई हिमालयी क्षेत्र की चिंता

अगस्त 2026 में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हुई बड़ी आपदा के बाद हिमालयी ग्लेशियरों को लेकर चिंता और बढ़ी है। वैज्ञानिकों के एक attribution study के अनुसार, लंबे समय से बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पतले होने और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने ने उस क्षेत्र को अस्थिर परिस्थितियों की ओर धकेला।

अध्ययन में कहा गया कि अगस्त में हिमालयी क्षेत्र का तापमान सामान्य से करीब 5 डिग्री सेल्सियस अधिक था और उसमें लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि को मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से जोड़ा गया। हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी आपदाओं में कई भौगोलिक और मौसम संबंधी कारक एक साथ काम करते हैं।

उत्तराखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं ग्लेशियर?

उत्तराखंड के ग्लेशियर केवल ऊंचे पहाड़ों पर जमी बर्फ नहीं हैं। ये राज्य और उत्तर भारत की जल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गंगोत्री, यमुनोत्री, मिलम, पिंडारी, खतलिंग और अन्य ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी विभिन्न नदियों और जल प्रणालियों को पोषण देता है।

भिलंगना घाटी के ग्लेशियरों से मिलने वाला पानी आगे चलकर भागीरथी नदी प्रणाली और टिहरी जलाशय तक पहुंचता है। इससे कृषि, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन जैसी गतिविधियों को समर्थन मिलता है।

ज्यादा पिघलना अभी पानी बढ़ा सकता है, लेकिन आगे संकट भी

ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर शुरुआत में नदी के प्रवाह में वृद्धि के रूप में दिखाई दे सकता है। लेकिन लंबे समय तक ग्लेशियरों के लगातार सिकुड़ने की स्थिति में बर्फ का भंडार कम होता जाएगा। इसका अर्थ है कि भविष्य में गर्म और शुष्क मौसम के दौरान नदियों को मिलने वाले ग्लेशियर-आधारित पानी में कमी आ सकती है।

वैज्ञानिकों ने इसी कारण ग्लेशियरों की लगातार निगरानी, सैटेलाइट सर्विलांस और प्रभावी शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर जोर दिया है।

बढ़ते तापमान के साथ बदल रहा हिमालय

हालिया शोधों से संकेत मिलता है कि हिमालय में बदलाव केवल ग्लेशियरों के पीछे हटने तक सीमित नहीं है। बर्फ की जगह ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश होना, गर्मियों का लंबा होना, बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव और पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।

विश्व मौसम attribution से जुड़े वैज्ञानिकों ने भी नेपाल की हालिया आपदा के संदर्भ में बताया कि ग्लेशियरों के पीछे हटने और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने से पहाड़ी संरचनाओं की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

Uttarakhand Glaciers Melting Rapidly: उत्तराखंड में निगरानी और तैयारी की जरूरत

नेपाल की आपदा और उत्तराखंड में सामने आए नए वैज्ञानिक आंकड़ों ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा तैयारी की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है। विशेषज्ञों के लिए चुनौती केवल ग्लेशियरों के पिघलने की निगरानी करना नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों की पहचान करना भी है जहां ग्लेशियल झीलों, भूस्खलन और अचानक बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में समय रहते खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान, नियमित वैज्ञानिक सर्वेक्षण, सैटेलाइट निगरानी और स्थानीय स्तर पर चेतावनी तंत्र महत्वपूर्ण हो सकते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी लगातार निगरानी और early-warning mechanisms को आवश्यक बताया गया है।

हिमालयी भविष्य के लिए बड़ा संकेत

उत्तराखंड के ग्लेशियरों पर सामने आए आंकड़े हिमालयी पर्यावरण में हो रहे दीर्घकालिक बदलाव का संकेत देते हैं। खतलिंग, मिलम, गंगोत्री और पिंडारी जैसे ग्लेशियरों में दर्ज पीछे हटने की दर और भिलंगना घाटी में बर्फ के नुकसान की बढ़ती गति वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण संकेत हैं।

नेपाल की हालिया आपदा ने यह भी दिखाया है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होने वाले बदलावों का असर पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। नदियों के रास्ते यह खतरा दूर-दराज के आबादी वाले क्षेत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे तक पहुंच सकता है। ऐसे में उत्तराखंड में ग्लेशियरों की निगरानी और हिमालयी आपदा प्रबंधन को वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर लगातार मजबूत करना महत्वपूर्ण रहेगा।

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