Vijay Diwas 2025: 1971 के युद्ध में उत्तराखंड के वीरों का अतुलनीय बलिदान, शौर्य की अमर गाथा
The unparalleled sacrifice and immortal saga of bravery of the heroes from Uttarakhand in the 1971 war.
देहरादून/हल्द्वानी: भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 की ऐतिहासिक जीत की स्मृति में हर वर्ष 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिन न केवल भारतीय सेना के अदम्य साहस का प्रतीक है, बल्कि उन हजारों सैनिकों के बलिदान को भी नमन करता है, जिन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। इसी युद्ध में पाकिस्तान को निर्णायक पराजय मिली थी और 93 हजार से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण किया था।
राज्यभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम, शहीदों को किया गया नमन
विजय दिवस के अवसर पर उत्तराखंड में विभिन्न स्थानों पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए। राज्यपाल गुरमीत सिंह, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के राज्यपाल रहे भगत सिंह कोश्यारी सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और सैन्य अधिकारियों ने 1971 के युद्ध में शहीद हुए जवानों को पुष्पांजलि अर्पित की। नेताओं ने कहा कि इन वीरों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता रहेगा।
1971 का युद्ध और उत्तराखंड का योगदान
1971 के युद्ध में उत्तराखंड के कुल 248 जवान मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे, जबकि 78 वीर सैनिक गंभीर रूप से घायल हुए। इसके अतिरिक्त, राज्य के 74 जवानों को उनकी असाधारण बहादुरी के लिए विभिन्न वीरता पदकों से सम्मानित किया गया। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यह युद्ध उत्तराखंड के लिए केवल एक सैन्य घटना नहीं, बल्कि त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति की अमर कथा है।
जिलेवार बलिदान की कहानी
उत्तराखंड के लगभग हर जिले ने इस युद्ध में अपने सपूत खोए। पिथौरागढ़ से सर्वाधिक 51 जवान शहीद हुए, जबकि देहरादून के 42 और चमोली के 31 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। बागेश्वर से 24, अल्मोड़ा से 23, लैंसडाउन और पौड़ी से 19-19 जवान शहीद हुए। नैनीताल के 12, टिहरी गढ़वाल के 10 और चंपावत के आठ सैनिकों ने देश के लिए प्राण न्यौछावर किए। रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी से एक-एक वीर जवान शहीद हुए, वहीं ऊधम सिंह नगर के सैनिकों का योगदान भी इस युद्ध में उल्लेखनीय रहा।
गांव-गांव में आज भी जीवित है शौर्य की स्मृति
जब शहीदों के पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर पहाड़ों के गांवों में पहुंचे, तो वहां शोक के साथ गर्व की भावना भी देखने को मिली। माताओं ने अपने बेटों को खोया, पत्नियों ने अपने सुहाग, लेकिन देश के लिए दिए गए बलिदान पर सिर गर्व से ऊंचा रखा। यही कारण है कि उत्तराखंड की मातृशक्ति को साहस और त्याग की मिसाल माना जाता है।
विजय दिवस पर यह स्मरण आवश्यक है कि उत्तराखंड के इन वीरों का बलिदान सदैव राष्ट्र की स्मृति में अमर रहेगा और देशवासियों को सेवा, समर्पण और शौर्य के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा।

