Heritage Craft Village Raghurajpur: कला की जीवंत प्रयोगशाला है रघुराजपुर, जहाँ पट्टाचित्र और उत्तराखंड की ऐपण कला का होता है अनूठा संगम
Heritage Craft Village Raghurajpur: Raghurajpur is a vibrant art laboratory, where a unique confluence of Pattachitra and Uttarakhand's Aipan art takes place.
भारत की सांस्कृतिक विविधता का सबसे सुंदर रूप तब देखने को मिलता है जब दो अलग-अलग राज्यों की कलाएं एक-दूसरे की पूरक नजर आती हैं। ओडिशा के पुरी जिले में स्थित रघुराजपुर (Raghurajpur) एक ऐसा ही गांव है, जिसे देश के पहले ‘हेरिटेज क्राफ्ट विलेज’ (धरोहर शिल्प ग्राम) का गौरव प्राप्त है। भार्गवी नदी के किनारे नारियल और ताड़ के कुंजों के बीच बसा यह गांव किसी ‘ओपन एयर आर्ट गैलरी’ से कम नहीं है।
हाल ही में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (PIB) के तत्वावधान में उत्तराखंड के 15 सदस्यीय मीडिया दल ने इस गांव का दौरा किया। इस भ्रमण के दौरान एक अद्भुत समानता उभर कर सामने आई—ओडिशा की विश्वप्रसिद्ध पट्टाचित्र कला और उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण (Aipan) कला के बीच का गहरा जुड़ाव।
जहाँ दीवारों पर बसते हैं देवता
भुवनेश्वर से 55 किमी और पुरी से महज 15 किमी की दूरी पर बसे इस गांव में प्रवेश करते ही आपकी आंखें रंग-बिरंगे भित्ति चित्रों (Murals) से चौंधिया जाएंगी। यहाँ कला केवल शौक नहीं, बल्कि भोजन की तरह रोजमर्रा की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा है। गांव के लगभग 160 परिवारों का हर सदस्य एक सिद्धहस्त कलाकार है।
दो संस्कृतियों की एक आत्मा
रघुराजपुर की पट्टाचित्र कला और कुमाऊं (उत्तराखंड) की ऐपण कला में कई समानताएं हैं जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं:
-
धार्मिक जड़ें: जहाँ पट्टाचित्र में भगवान जगन्नाथ, राधा-कृष्ण और रामायण-महाभारत के प्रसंग उकेरे जाते हैं, वहीं उत्तराखंड की ऐपण कला में देवी-देवताओं की चौकियां और धार्मिक प्रतीक बनाए जाते हैं।
-
प्राकृतिक रंगों का उपयोग: पट्टाचित्र कलाकार इमली के बीज, शंख और फूलों से रंग तैयार करते हैं। ठीक इसी तरह, ऐपण में गेरू (लाल मिट्टी) और चावल के घोल (बिश्वर) का प्रयोग किया जाता है।
-
बारीक कारीगरी: दोनों ही कला विधाओं में रेखाओं की सटीकता और बारीक नक्काशी का विशेष महत्व है। रघुराजपुर के कलाकार वसंत कुमार महाराणा बताते हैं कि यह परंपरा 5वीं शताब्दी से अनवरत चली आ रही है।
कलाकारों की जन्मस्थली और आत्मनिर्भरता का मॉडल
रघुराजपुर केवल चित्रों का गांव नहीं है, बल्कि यह महान विभूतियों की जन्मस्थली भी है।
-
पद्मभूषण डॉ. जगन्नाथ महापात्रा: प्रसिद्ध पट्टाचित्र कलाकार।
-
पद्मश्री केलुचरण मोहापात्रा: ओडिसी नृत्य के पुरोधा।
-
पद्मश्री मगुनी चरण दास: गोटीपुआ नृत्य के दिग्गज।
आज यह गांव पूरी तरह से कला के बल पर आत्मनिर्भर है। यहाँ ताड़पत्र उत्कीर्णन, पत्थर की नक्काशी, पेपर माशे (कागज की लुगदी से मूर्तियां बनाना) और ‘गंजापा’ जैसे पारंपरिक हाथ से बने ताश के पत्ते तैयार किए जाते हैं। पट्टाचित्र कलाकार आशीष कुमार साहू बताते हैं कि यहाँ गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है, जिससे युवाओं को रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता।
उत्तराखंड की पहचान और स्वरोजगार की नई राह
ठीक रघुराजपुर की तरह उत्तराखंड में भी ‘ऐपण’ अब केवल दहलीज की सजावट तक सीमित नहीं है। शुभता और मंगलकामना का प्रतीक यह कला अब कुशन कवर, डायरी, मग और पिछोड़ा (पारंपरिक ओढ़नी) के माध्यम से बाजार में अपनी जगह बना चुकी है। कुमाऊं की महिलाएं ऐपण के जरिए आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं, जो रघुराजपुर के आत्मनिर्भर मॉडल की याद दिलाता है।
पर्यटन और संस्कृति का संगम
रघुराजपुर में हर साल आयोजित होने वाला ‘रघुराजपुर उत्सव’ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है। यहाँ आने वाले सैलानी न केवल कलाकृतियां खरीदते हैं, बल्कि कलाकारों के साथ बैठकर चित्रकारी के गुर भी सीखते हैं। यह ‘अनुभवात्मक पर्यटन’ (Experiential Tourism) का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसे उत्तराखंड के सीमांत गांवों (वाइब्रेंट विलेज) में भी ऐपण और स्थानीय हस्तशिल्प के माध्यम से विकसित किया जा सकता है।


