Kumar Vishwas in Lekhak Gaon: लेखक गांव पहुंचे कुमार विश्वास, बोले- मोबाइल नहीं किताबों से जोड़ें रिश्ता
Kumar Vishwas in Lekhak Gaon: Kumar Vishwas Arrives in 'Writers' Village', Says—Forge a Bond with Books, Not Mobile Phones
देहरादून स्थित लेखक गांव एक बार फिर साहित्य, संस्कृति और युवा चेतना का केंद्र बना, जब प्रख्यात कवि और कथावाचक डॉ. कुमार विश्वास यहां आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हुए। सुमित्रानंदन पंत की जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में देशभर से साहित्यकार, शिक्षाविद, छात्र और कला जगत से जुड़े लोग पहुंचे।
इस दौरान डॉ. कुमार विश्वास ने युवाओं से किताबों से जुड़ने और मोबाइल स्क्रीन पर कम समय बिताने की अपील की। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को यदि अच्छा साहित्य रचना है तो पहले उसे पढ़ने की आदत विकसित करनी होगी।
‘लेखक गांव सिर्फ स्थान नहीं, एक साहित्यिक आंदोलन’
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि लेखक गांव केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह भारतीय साहित्य, संस्कृति और संवेदनाओं का जीवंत केंद्र बनता जा रहा है। यहां नई पीढ़ी अपनी जड़ों, भाषा और परंपराओं से जुड़ना सीख रही है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में तकनीक जरूरी है, लेकिन यदि युवा अपना अधिकांश समय मोबाइल स्क्रीन पर बिताएंगे तो साहित्य, विचार और संवेदनाओं से दूरी बढ़ जाएगी। इसलिए पुस्तकों को जीवन का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है।
Kumar Vishwas in Lekhak Gaon कार्यक्रम के दौरान उन्होंने युवाओं से कहा कि अच्छी कविता लिखने से पहले हजार कविताएं पढ़नी पड़ती हैं। पढ़ने की आदत ही व्यक्ति की सोच को गहराई देती है।
सुमित्रानंदन पंत को किया याद
राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय ‘सुमित्रानंदन पंत साहित्य पर्यटन पथ’ रखा गया था। इस अवसर पर कुमार विश्वास ने छायावाद के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत को याद करते हुए कहा कि पंत जी ने प्रयाग में रहते हुए भी अपने भीतर हिमालय और उत्तराखंड की आत्मा को हमेशा जीवित रखा।
उन्होंने कहा कि पंत का साहित्य केवल प्रकृति का वर्णन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और संवेदनाओं का गहरा प्रतिबिंब है। हिमालय, प्रकृति और मानवीय मूल्यों को जिस सुंदरता से पंत जी ने अपनी रचनाओं में पिरोया, वह आज भी युवाओं को प्रेरित करता है।
कविता सुनाकर बांधा समां
कार्यक्रम के दौरान कुमार विश्वास ने अपनी चर्चित पंक्तियां, मैं तुम्हें सपने देने आया हूं, बेचने नहीं, सुनाकर उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया। सभागार में मौजूद छात्रों और साहित्य प्रेमियों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया। उनकी प्रस्तुति के दौरान युवा बड़ी संख्या में मौजूद रहे और कई छात्रों ने कार्यक्रम के बाद साहित्य और लेखन को लेकर उनसे सवाल भी पूछे।
लेखक गांव बना नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा केंद्र
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और लेखक गांव के संस्थापक डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कहा कि लेखक गांव का उद्देश्य साहित्य, संस्कृति और भारतीय चिंतन को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
उन्होंने कहा कि सुमित्रानंदन पंत की रचनाओं में हिमालय की चेतना, प्रकृति की पवित्रता और भारतीय संस्कृति की आत्मा बसती है। लेखक गांव उसी साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
निशंक ने कहा कि आज के समय में युवाओं को साहित्य और संस्कृति से जोड़ना बेहद जरूरी है, क्योंकि यही हमारी पहचान और विरासत है।
साहित्य और प्रकृति का गहरा संबंध
कार्यक्रम में पर्यावरणविद पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा कि साहित्य और प्रकृति का रिश्ता बहुत गहरा है। उत्तराखंड की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाने में साहित्यकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
उन्होंने कहा कि जब साहित्य प्रकृति से जुड़ता है, तब समाज में संवेदनशीलता और जागरूकता बढ़ती है। हिमालय और उत्तराखंड का साहित्य हमेशा से पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता रहा है।
युवाओं को मिला रचनात्मकता का संदेश
भाषा संस्थान की निदेशक डॉ. मायावती ढकरीयाल ने छात्रों से अपील की कि वे सुमित्रानंदन पंत के जीवन और साहित्य से प्रेरणा लें। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल पढ़ाई का विषय नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम भी है।
उन्होंने युवाओं से रचनात्मकता, अध्ययन और लेखन की ओर आगे बढ़ने का आह्वान किया। कार्यक्रम में कई युवा छात्रों ने कविता पाठ और साहित्यिक चर्चाओं में भी भाग लिया।
साहित्यकारों और कलाकारों की रही मौजूदगी
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में साहित्य, शिक्षा और कला जगत से जुड़े कई प्रतिष्ठित लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम में डॉ. कमला पंत, डॉ. विद्या सिंह, डॉ. शशांक शुक्ला और संजय मेहर ने भी सुमित्रानंदन पंत के व्यक्तित्व और साहित्य पर अपने विचार साझा किए।
इसके अलावा विख्यात अभिनेत्री और फिल्म निर्माता डॉ. आरुषि निशंक, विदुषी निशंक, प्रोफेसर प्रदीप भारद्वाज, डॉ. नीरज शर्मा कुकरेती, डॉ. राकेश सुंदरियाल और डॉ. बेचेन कंडियाल समेत कई लेखक और शिक्षाविद कार्यक्रम में शामिल हुए।
क्यों खास बन रहा है लेखक गांव?
देहरादून का लेखक गांव धीरे-धीरे देशभर के साहित्य प्रेमियों के लिए एक बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। यहां समय-समय पर साहित्यिक गोष्ठियां, कवि सम्मेलन, पुस्तक विमोचन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजन युवाओं को भारतीय साहित्य और संस्कृति से जोड़ने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। डिजिटल दौर में जहां पढ़ने की आदत कम होती जा रही है, वहीं लेखक गांव जैसे प्रयास साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
किताबों से जुड़ना क्यों जरूरी?
कार्यक्रम के अंत में कुमार विश्वास ने कहा कि किताबें इंसान को सोचने, समझने और समाज को देखने का नजरिया देती हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में लोग तेजी से सूचना तो पा रहे हैं, लेकिन गहराई से पढ़ने की आदत कम हो रही है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे रोज थोड़ा समय किताबों के लिए जरूर निकालें। उनका मानना है कि साहित्य इंसान को संवेदनशील, रचनात्मक और बेहतर नागरिक बनाता है। Kumar Vishwas in Lekhak Gaon कार्यक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि साहित्य केवल शब्द नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति को जोड़ने वाली सबसे मजबूत कड़ी है।


