राज्यसभा में गूंजा उत्तराखंड का गौरव, सांसद महेंद्र भट्ट ने गौरा देवी को भारत रत्न देने की उठाई मांग
Uttarakhand's pride resonated in the Rajya Sabha, MP Mahendra Bhatt raised the demand for Bharat Ratna for Gaura Devi.
देहरादून: संसद का शीतकालीन सत्र इन दिनों अपने चरम पर है। लोकसभा और राज्यसभा में लगातार बहस और चर्चाओं का दौर जारी है। इसी दौरान उत्तराखंड के राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने सदन में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए चिपको आंदोलन की प्रेरणादायी हस्ती गौरा देवी को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग रखी है।
गौरा देवी के योगदान का राज्यसभा में उल्लेख
सांसद महेंद्र भट्ट ने सदन में बोलते हुए चिपको आंदोलन के इतिहास को विस्तार से बताया और इस आंदोलन की अग्रणी रही गौरा देवी के साहस और पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनके समर्पण को याद किया। उन्होंने कहा कि गौरा देवी ने न सिर्फ अपने गांव के जंगलों को बचाया, बल्कि उन्होंने पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण का एक ऐसा संदेश दिया, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है।
उन्होंने बताया कि गौरा देवी चमोली जिले के जोशीमठ विकासखंड के रैणी गांव की भोटिया जनजाति से थीं। पहाड़ के कठिन जीवन के बीच उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर पेड़ों की कटाई के खिलाफ ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी और चिपको आंदोलन को जन्म दिया।
51 वर्ष पहले शुरू हुआ था जनआंदोलन
महेंद्र भट्ट ने बताया कि चिपको आंदोलन का शुभारंभ 26 मार्च 1973 को रैणी गांव के पास तब हुआ था, जब वन विभाग द्वारा पेड़ों की कटाई के लिए एक ठेकेदार को जंगल आवंटित किया गया। इन जंगलों पर आसपास के ग्रामीणों की आजीविका और जरूरतें निर्भर थीं। जब ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं को पेड़ों की कटाई की सूचना मिली, तो गांव की प्रधान गौरा देवी के नेतृत्व में सभी महिलाएं एकजुट हो गईं।
उन्होंने जंगल में पहुंचकर पेड़ों से लिपटकर कटाई रोकने का निर्णय लिया। ठेकेदार और मजदूरों के विरोध के बावजूद महिलाएं कई दिनों तक डटी रहीं और अंततः उन्हें जंगल से वापस लौटना पड़ा। पेड़ों को गले लगाकर संरक्षण करने की इस अनूठी पहल ने पूरे देश का ध्यान खींचा और आंदोलन धीरे-धीरे हिमाचल, राजस्थान, बिहार और कर्नाटक तक फैल गया।
चिपको की गूंज और केंद्र सरकार का ऐतिहासिक निर्णय
इस आंदोलन के प्रभाव से तत्कालीन केंद्र सरकार ने हिमालयी राज्यों में 15 वर्ष तक पेड़ों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में इसे भारत के सबसे सफल जनआंदोलनों में गिना जाता है।
भारत रत्न देने की मांग मजबूत होती हुई
सांसद भट्ट ने कहा कि चिपको आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह महिलाओं की सहभागिता, पर्यावरणीय चेतना और सामुदायिक नेतृत्व की एक मिसाल है। ऐसे में गौरा देवी को भारत रत्न दिया जाना उनके योगदान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
गौरा देवी के बलिदान और नेतृत्व की कहानी आज भी प्रेरणा देने वाली है, और संसद में उठी यह मांग उत्तराखंड सहित पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण के महत्व को फिर से रेखांकित करती है।

