उत्तराखंड

Harish Rawat Yatra: हाईकमान की रोक के बाद भी नहीं थमे हरीश रावत, जसपुर से हल्द्वानी तक आज फिर निकलेंगे

Harish Rawat Yatra: Harish Rawat undeterred despite the High Command's halt; to set out again today from Jaspur to Haldwani.

उत्तराखंड कांग्रेस में चुनावी तैयारियों के बीच एक बार फिर अंदरूनी खींचतान सामने आती दिखाई दे रही है। पार्टी हाईकमान की आपत्ति के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत अपनी ‘धन्यवाद एवं जन संवाद यात्रा’ को आगे बढ़ाने के फैसले पर कायम हैं। रावत ने साफ संकेत दिया है कि कुमाऊं क्षेत्र में प्रस्तावित यात्रा को फिलहाल रोका नहीं जाएगा। सोमवार को यह यात्रा जसपुर से शुरू होकर कई प्रमुख इलाकों से गुजरते हुए हल्द्वानी पहुंचेगी।

रावत की ओर से सोशल मीडिया पर यात्रा को लेकर संदेश जारी किया गया है। उन्होंने अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं से साथ चलने की अपील करते हुए कहा कि उत्तराखंड के स्वाभिमान के लिए संघर्ष जारी रखना होगा। उनके इस रुख से प्रदेश कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, संगठन और आगामी चुनावों को लेकर चल रही चर्चाओं को फिर हवा मिल गई है।

जसपुर से शुरू होगी यात्रा, हल्द्वानी तक रहेगा कार्यक्रम

Harish Rawat Yatra का यह चरण सोमवार सुबह करीब 11:30 बजे जसपुर से शुरू होने की बात कही गई है। इसके बाद यात्रा काशीपुर, रामनगर और कालाढूंगी से होते हुए हल्द्वानी पहुंचेगी। रास्ते में रावत के समर्थकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ संवाद और जनसंपर्क कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।

हरीश रावत ने अपने सोशल मीडिया संदेश में कहा कि चुनौती बड़ी है, लेकिन उत्तराखंड के हित और स्वाभिमान को लेकर उनका संकल्प मजबूत है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से आगे बढ़ने और राज्य में बदलाव के लिए काम करने का आह्वान किया।

रावत के इस संदेश को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। वह लंबे समय से प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करने और जनता के बीच पार्टी की पकड़ बढ़ाने की बात करते रहे हैं।

कांग्रेस हाईकमान ने यात्रा पर जताई थी आपत्ति

हरीश रावत के यात्रा कार्यक्रम को लेकर विवाद तब बढ़ा जब कांग्रेस हाईकमान की ओर से इसे लेकर आपत्ति जताई गई। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव और उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी कुमारी शैलजा ने रावत को पत्र भेजकर यात्रा के आयोजन पर नाराजगी व्यक्त की थी।

शैलजा ने पत्र में कहा था कि पार्टी को इस यात्रा के बारे में जानकारी मिली, लेकिन इसे लेकर न तो उनसे और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से चर्चा की गई। ऐसे में पार्टी नेतृत्व ने इस तरह के समानांतर कार्यक्रम को उचित नहीं माना।

हाईकमान की चिंता का एक बड़ा कारण चुनावी समय में पार्टी के भीतर एकजुटता बनाए रखना भी बताया गया। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि चुनाव से पहले पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं और संगठन को एक साझा रणनीति के तहत काम करना चाहिए।

विवादित बयानों का भी किया गया जिक्र

कुमारी शैलजा की ओर से रावत को भेजे गए पत्र में उनके हालिया बयानों का भी उल्लेख किया गया। पार्टी प्रभारी ने संकेत दिया कि रावत के कुछ बयानों को लेकर संगठन में असहजता पैदा हुई थी।

पत्र में यह भी कहा गया कि आने वाले महीनों में राज्य में चुनाव होने हैं। ऐसे समय में कांग्रेस को एकजुट होकर जनता के बीच जाना चाहिए। पार्टी नेतृत्व की ओर से रावत से आग्रह किया गया कि वह ऐसे कार्यक्रमों को आगे न बढ़ाएं, जिनसे संगठन के भीतर अलग संदेश जा सकता है।

हालांकि, हाईकमान की इस आपत्ति के बावजूद रावत ने यात्रा जारी रखने का फैसला किया है। इससे उत्तराखंड कांग्रेस की आंतरिक राजनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

प्रदेश कांग्रेस में भी उठे थे सवाल

इस पूरे मामले में सिर्फ हाईकमान ही नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व की नाराजगी भी सामने आई थी। प्रदेश संगठन से जुड़े नेताओं ने पार्टी प्रभारी के सामने इस बात पर आपत्ति जताई कि रावत ने यात्रा को लेकर संगठन के साथ पर्याप्त चर्चा नहीं की।

कांग्रेस के भीतर यह तर्क दिया गया कि चुनावी माहौल में प्रदेश नेतृत्व और वरिष्ठ नेताओं को मिलकर कार्यक्रम तय करने चाहिए। किसी बड़े राजनीतिक कार्यक्रम की घोषणा से पहले संगठन को विश्वास में लेने की जरूरत होती है।

बताया गया कि इस मुद्दे को लेकर संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से चर्चा के बाद प्रदेश प्रभारी ने रावत से स्पष्टीकरण मांगा। ऐसे में अब रावत का यात्रा जारी रखने का फैसला पार्टी के भीतर नई बहस को जन्म दे सकता है।

रावत के तेवर से क्या निकलेगा राजनीतिक संदेश?

हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रमुख और अनुभवी नेताओं में शामिल हैं। मुख्यमंत्री रहने के अलावा वह लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहे हैं। ऐसे में उनकी किसी भी राजनीतिक गतिविधि का असर केवल उनके समर्थकों तक सीमित नहीं रहता।

Harish Rawat Yatra को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। रावत जिस तरह लगातार जनता के बीच पहुंचने और संवाद बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं, उससे साफ है कि वह चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक सक्रियता कम करने के मूड में नहीं हैं।

दूसरी ओर कांग्रेस संगठन के सामने चुनौती यह है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की व्यक्तिगत सक्रियता और केंद्रीय नेतृत्व की चुनावी रणनीति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अगर दोनों पक्षों के बीच तालमेल नहीं बैठा तो चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही अंदरूनी मतभेद पार्टी के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं।

ED समन पर भी रावत ने सरकार को घेरा

यात्रा विवाद के बीच हरीश रावत ने प्रवर्तन निदेशालय यानी ED के समन को लेकर भी केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकार पर निशाना साधा है। रावत ने इसे चुनावी घबराहट और सत्ता के अहंकार से जोड़ते हुए सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक चुनौतियों से वह घबराने वाले नहीं हैं और ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार हैं। हालांकि, ED से जुड़े मामले में जांच और कानूनी प्रक्रिया को लेकर अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच एजेंसी और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही तय होंगे।

आगे बढ़ेगी यात्रा या फिर बदलेगा फैसला?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस हाईकमान की आपत्ति के बाद भी हरीश रावत की यात्रा कितनी दूर तक जारी रहती है और इसका प्रदेश संगठन पर क्या असर पड़ता है। जसपुर से हल्द्वानी तक प्रस्तावित कार्यक्रम के जरिए रावत एक बार फिर सीधे जनता के बीच पहुंचने जा रहे हैं।

आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व और रावत के बीच बातचीत से इस विवाद का रास्ता निकल सकता है। लेकिन फिलहाल रावत के तेवर से इतना जरूर साफ है कि वह अपनी राजनीतिक सक्रियता रोकने के लिए तैयार नहीं दिख रहे। उत्तराखंड कांग्रेस में यह टकराव चुनावी तैयारियों के बीच पार्टी की एकजुटता के लिए कितना महत्वपूर्ण साबित होगा, इस पर सभी की नजर रहेगी।

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