Kali Shila Temple: 12 साल की बालिका के रूप में प्रकट हुई थीं मां भगवती, पटियाला के महाराजा की तपस्या से जुड़ी है मान्यता
Goddess Bhagwati appeared in the form of a 12-year-old girl, the legend is linked to the penance of the Maharaja of Patiala.

रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले की ऊखीमठ घाटी में स्थित महा सिद्धपीठ मां कालीशिला धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता का अनूठा संगम है। समुद्र तल से लगभग 2,300 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित यह सिद्धस्थल मां भगवती के कौशिक स्वरूप और विशिष्ट पूजा परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां हर साल श्रद्धालु मां के दर्शन और आध्यात्मिक शांति की कामना लेकर पहुंचते हैं।
12 वर्षीय बालिका के रूप में प्रकट हुई थीं मां भगवती
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज जैसे असुरों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए मां भगवती ने दिव्य स्वरूप धारण किया था। मान्यता है कि कालीशिला क्षेत्र में मां 12 वर्षीय बालिका के रूप में कौशिक स्वरूप में प्रकट हुईं और बाद में महाकाली का उग्र रूप धारण किया। यहां स्थित दिव्य शिला को मां की शक्ति और लीलाओं से जोड़कर देखा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि शिला पर मां के चरण चिह्न मौजूद हैं। इसी मान्यता के कारण कालीशिला को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है।
पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह की तपस्या का प्रसंग
महा सिद्धपीठ कालीशिला से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह की तपस्या से संबंधित है। स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार, लगभग 150 वर्ष पहले महाराजा ने पुत्र प्राप्ति की कामना से यहां साधना की थी। मान्यता है कि मां भगवती की कृपा से उनकी इच्छा पूरी हुई।
हालांकि, इस प्रसंग की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए स्वतंत्र दस्तावेजों की आवश्यकता है। श्रद्धालु इसे मां की महिमा और तपस्या के फल से जुड़ी आस्था के रूप में देखते हैं।
कच्चा दूध और पंचमेवा चढ़ाने की परंपरा
कालीशिला की पूजा पद्धति भी इसे दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है। यहां मां को कच्चा दूध, फल-फूल और पंचमेवा अर्पित करने की परंपरा बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, यहां पका हुआ भोजन नहीं चढ़ाया जाता। पूजा के दौरान सात्विकता, शुद्धता और धार्मिक मर्यादाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है।
64 योगिनियों से जुड़ा है क्षेत्र
धार्मिक परंपराओं में कालीशिला को 64 योगिनियों और दिव्य यंत्रों से जुड़ा सिद्धस्थल माना जाता है। कालीमठ और कालीशिला की साधना परंपराओं में भी अंतर बताया जाता है। कालीमठ में श्रीयंत्र की पूजा की जाती है, जबकि कालीशिला सात्विक आराधना के लिए प्रसिद्ध है।
हिमालय की चोटियों के बीच बसा दिव्य धाम
मौसम साफ रहने पर कालीशिला से सुमेरु, चौखंबा, तुंगनाथ और आसपास की पर्वत शृंखलाओं के मनोरम दृश्य दिखाई देने की बात कही जाती है। धार्मिक यात्रा के साथ यह क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करता है।
कैसे पहुंचें: कालीशिला जाने के लिए गुप्तकाशी से कालीमठ मार्ग पर जग्गी बगवान और ब्यूंखी तक वाहन से पहुंचा जा सकता है। इसके बाद लगभग 2 से 3 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है। यात्रा से पहले स्थानीय मार्ग और मौसम की स्थिति की जानकारी लेना उचित है।


