मसूरी से उठी थी अलग राज्य की चिंगारी, इतिहासकार गोपाल भारद्वाज ने याद किए उत्तराखंड आंदोलन के 70 साल के संघर्ष
The spark for a separate state originated in Mussoorie, Historian Gopal Bhardwaj recalls 70 years of struggle in the Uttarakhand movement
मसूरी: उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर मसूरी के प्रख्यात इतिहासकार गोपाल भारद्वाज ने राज्य आंदोलन के संघर्षपूर्ण और भावनात्मक पलों को याद किया। इस अवसर पर उन्होंने 1955 से लेकर 2000 तक चले आंदोलन की दुर्लभ तस्वीरें प्रदर्शित कीं, जिन्हें देखकर लोगों की आंखें नम हो गईं। भारद्वाज ने कहा कि अलग उत्तराखंड की लड़ाई आज से लगभग 70 साल पहले मसूरी में शुरू हुई थी और यह आंदोलन 1994 तक लगातार सुलगता रहा।
1955 में रखी गई थी अलग राज्य की नींव
गोपाल भारद्वाज ने बताया कि उत्तराखंड राज्य निर्माण की बुनियाद 1955 में मसूरी नगर पालिका परिषद से रखी गई थी, जब पहली बार उत्तर प्रदेश के पहाड़ी जिलों को अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया। उन्होंने कहा कि उस समय पहाड़ी क्षेत्रों में विकास का बजट बेहद कम था, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाती थीं। यही असमानता आंदोलन की चिंगारी बनी, जो वर्षों तक जलती रही।
1994 का मसूरी गोलीकांड – आंदोलन का निर्णायक मोड़
इतिहासकार भारद्वाज ने बताया कि 1994 में आरक्षण विरोधी आंदोलन के बीच उत्तराखंड राज्य की मांग ने नया रूप ले लिया। 2 सितंबर 1994 को मसूरी के शहीद भवन में धरना दे रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोली चला दी। इस गोलीकांड में छह आंदोलनकारियों ने शहादत दी, जबकि एक पुलिस अधिकारी की भी मौत हुई।
उन्होंने कहा, “उस दिन मसूरी ने जो देखा, वह राज्य आंदोलन का सबसे दर्दनाक अध्याय बन गया। इन शहीदों के बलिदान ने आंदोलन को नई दिशा दी और पूरे पहाड़ में अलग राज्य की मांग तेज़ हो गई।”
9 नवंबर 2000 – मसूरी में गूंजा ‘जय उत्तराखंड’
भारद्वाज ने कहा कि 9 नवंबर 2000 का दिन मसूरी की यादों में हमेशा जीवित रहेगा, जब उत्तराखंड राज्य का औपचारिक गठन हुआ। उन्होंने बताया कि उस दिन मसूरी की गलियों में ढोल-नगाड़ों की थाप और “जय उत्तराखंड” के नारों से पूरा शहर गूंज उठा था। भारद्वाज ने उस ऐतिहासिक दिन की तस्वीरें भी प्रदर्शित कीं, जिनमें जश्न और गर्व का माहौल झलकता है।
“शहीदों का सपना अभी अधूरा”
इतिहासकार ने कहा कि उत्तराखंड ने 25 वर्षों में विकास के क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन शहीदों और आंदोलनकारियों की कल्पना का उत्तराखंड अभी अधूरा है। उन्होंने कहा, “हमने राज्य इसलिए मांगा था ताकि पहाड़ों में रोजगार बढ़े, पलायन रुके और पर्यावरण सुरक्षित रहे, लेकिन आज भी गांव खाली हो रहे हैं।”
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि अब संतुलित विकास पर ध्यान दिया जाए, जिसमें पहाड़ का पर्यावरण, संस्कृति और रोजगार तीनों को समान प्राथमिकता मिले। उन्होंने कहा, “उत्तराखंड का असली विकास तभी होगा जब पहाड़ का युवा, उसकी जमीन और उसका जंगल तीनों वहीं रहेंगे।”



