Forest Beekeeping Policy: उत्तराखंड में ‘Forest Beekeeping Policy’ लागू, वन क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन से बढ़ेगी आय और घटेगा मानव-हाथी संघर्ष
Forest Beekeeping Policy: ‘Forest Beekeeping Policy’ Implemented in Uttarakhand; Beekeeping in Forest Areas to Boost Income and Reduce Human-Elephant Conflict.
उत्तराखंड सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए एक अहम कदम उठाया है। राज्य में अब Forest Beekeeping Policy के तहत आरक्षित वन क्षेत्रों में भी मधुमक्खी पालन की अनुमति दी जाएगी। इस नई नीति का उद्देश्य केवल शहद उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों की आय में वृद्धि करना और मानव-हाथी संघर्ष जैसी गंभीर समस्या का समाधान निकालना भी है।
राज्य सरकार द्वारा तैयार की गई ‘उत्तराखंड वन-सीमांत मौन-पालन, मधुमक्खी आधारित आजीविका एवं मानव-हाथी संघर्ष न्यूनीकरण नीति’ को कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है। इस Forest Beekeeping Policy के लागू होने के बाद सीमांत गांवों में रहने वाले किसानों और स्थानीय समुदायों को नई आजीविका के अवसर मिलेंगे।
Forest Beekeeping Policy क्या है और क्यों है खास?
उत्तराखंड के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र में वन फैले हुए हैं। ऐसे में सरकार ने इन क्षेत्रों का उपयोग आजीविका बढ़ाने के लिए करने का निर्णय लिया है। Forest Beekeeping Policy के तहत वन सीमांत क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे शहद, मोम, पराग और अन्य उत्पादों के जरिए आय के नए स्रोत विकसित होंगे।
यह नीति खास इसलिए भी है क्योंकि यह पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे कई मुद्दों को एक साथ संबोधित करती है।
मानव-हाथी संघर्ष कम करने में कैसे मदद करेगी?
उत्तराखंड के कई इलाकों में हाथियों के कारण फसल नुकसान और जनहानि की घटनाएं सामने आती रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, मधुमक्खियों की आवाज और गतिविधि से हाथी दूर रहते हैं। इसी आधार पर Forest Beekeeping Policy के तहत खेतों और गांवों की सीमाओं पर मधुमक्खी बक्सों की ‘जैव बाड़’ (Bio-fencing) बनाई जाएगी।
यह तरीका न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि बिना किसी हिंसक उपाय के हाथियों को गांवों से दूर रखने में मदद करेगा। इससे ग्रामीणों की सुरक्षा बढ़ेगी और फसलों को भी नुकसान कम होगा।
किसानों और स्थानीय समुदाय को मिलेगा लाभ
इस Forest Beekeeping Policy का सबसे बड़ा फायदा किसानों और ग्रामीण युवाओं को होगा। मधुमक्खी पालन से न केवल शहद उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि इससे जुड़े अन्य उत्पाद जैसे मोम, प्रोपोलिस और रॉयल जेली भी अतिरिक्त आय का स्रोत बनेंगे।
सरकार इस योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों, महिला समूहों और युवाओं को जोड़ने पर विशेष जोर दे रही है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और पलायन की समस्या को भी कम करने में मदद मिलेगी।
हनी क्लस्टर और ‘मधुग्राम’ मॉडल का विकास
राज्य सरकार Forest Beekeeping Policy के तहत ‘वन सीमांत हनी क्लस्टर’ और ‘मधुग्राम’ मॉडल विकसित करने की योजना बना रही है। इसके जरिए शहद उत्पादन को संगठित तरीके से बढ़ाया जाएगा और उत्पादों की ब्रांडिंग व मार्केटिंग को भी मजबूती मिलेगी।
स्थानीय स्तर पर शहद संग्रह केंद्र, प्रोसेसिंग यूनिट और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए बिक्री की व्यवस्था की जाएगी। इससे उत्तराखंड का ऑर्गेनिक शहद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच सकेगा।
प्रशिक्षण और अनुदान की व्यवस्था
नीति के तहत किसानों और इच्छुक लोगों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। वन विभाग, कृषि विभाग और उद्यान विभाग मिलकर प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करेंगे। इसके अलावा मधुमक्खी बक्सों, सुरक्षा उपकरणों और प्रोसेसिंग मशीनों पर अनुदान भी दिया जाएगा। इससे छोटे और सीमांत किसानों के लिए इस क्षेत्र में प्रवेश करना आसान होगा।
सख्त निगरानी और मूल्यांकन प्रणाली
Forest Beekeeping Policy में निगरानी और मूल्यांकन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। मानव-हाथी संघर्ष की घटनाओं, शहद उत्पादन, किसानों की आय और पर्यावरणीय प्रभावों का नियमित आकलन किया जाएगा। तीन साल के अंतराल में थर्ड पार्टी द्वारा मूल्यांकन भी कराया जाएगा, जिससे नीति की प्रभावशीलता का सही आकलन हो सके।
सरकार का क्या कहना है?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड में मधुमक्खी पालन की अपार संभावनाएं हैं। यह नीति न केवल किसानों की आय बढ़ाएगी, बल्कि पूरे देश के लिए एक मॉडल के रूप में उभरेगी। वहीं, वन मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि इस योजना से ऑर्गेनिक शहद उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।


