
नई दिल्ली:( एजेंसी) गठबंधन में तालमेल का अभाव झारखंड में सत्ता बनाये रखने की इंडिया ब्लॉक की कोशिश में रोड़ा बन सकता है भारत के अपेक्षाकृत नये राज्यों में शामिल झारखंड देश के उन राज्यों में से एक है जहां उसकी सर्वाधिक आदिवासी आबादी रहती है। यह देश के खनिज संसाधनों के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में से भी एक है, लेकिन इसके लगभग एक चौथाई बाशिंदे गरीबी से पीड़ित हैं। ऐसे में झारखंड का महत्व बताने के लिए ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं। राज्य में 13 और 20 नवंबर को दो चरणों में विधानसभा चुनाव को देखते हुए, दो गठबंधनों – सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा-नीत इंडिया ब्लॉक और भारतीय जनता पार्टी-नीत एनडीए – के बीच लड़ाई का मैदान तैयार हो चुका है।
गठबंधन में तालमेल का अभाव झारखंड में सत्ता बनाये रखने की इंडिया ब्लॉक की कोशिश में रोड़ा बन सकता है।
झारखंड गठबंधनों और नेतृत्व में बार-बार बदलाव देखता रहा है, लेकिन पिछले दो कार्यकालों (2014-19 तक भाजपा का और 2019-24 तक झामुमो-नीत गठबंधन का) में अपेक्षाकृत स्थिरता रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन प्रवर्तन निदेशालय द्वारा गिरफ्तारी के पश्चात इस्तीफा देने और जमानत मिलने पर दोबारा पदासीन होने के बाद तूफान से निकलने में कामयाब रहे। वर्ष 2024 के आम चुनाव में, केंद्र सरकार द्वारा उनकी गिरफ्तारी को आदिवासियों ने बदले की भावना से उठाये गये कदम के रूप में देखा, जिससे झामुमो और उसकी सहयोगी कांग्रेस को फायदा हुआ। उन्होंने राज्य की 14 सीटों में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए सुरक्षित पांचों सीटें जीत लीं। लेकिन, इसके बावजूद भाजपा और उसकी सहयोगी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) ने इंडिया ब्लॉक के 39.62 फीसदी के मुकाबले 47.2 फीसदी वोट हासिल किये, जो साफ-साफ आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी विभाजन दिखाता है। झारखंड की कुल आबादी का 26.21 फीसदी आदिवासी हैं।

आजसू के साथ अपना गठबंधन मजबूत करके, भाजपा 2019 के मुकाबले बेहतर विधानसभा चुनाव नतीजों की उम्मीद कर रही है। तब दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। अगर उम्मीदवारों और सीटों की साझेदारी के एलान को कोई संकेत माना जाए, तो इंडिया ब्लॉक के मुकाबले भाजपा-नीत गठबंधन बेहतर तालमेल दिखा रहा है। इंडिया ब्लॉक में राष्ट्रीय जनता दल और भाकपा (माले)-लिबरेशन ने सीटों के आवंटन पर कुछ असंतोष दिखाया है। नैरेटिव के मोर्चे पर, हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाला इंडिया ब्लॉक अपने आदिवासी जनाधार को मजबूत करना चाह रहा है, साथ ही अपनी सरकार द्वारा लागू कल्याणकारी योजनाओं के लिए अन्य मतदाताओं के समर्थन की खातिर लालायित है। महिलाओं के लिए नकद ट्रांसफर स्कीम ‘मैया सम्मान योजना’ काफी लोकप्रिय है, लेकिन यह देखा जाना बाकी है कि क्या यह वाहवाही के अलावा वोट भी दिलायेगी। भाजपा विभाजन से वाकिफ है और उसने यह समस्या ग्रस्त नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की है
- “घुसपैठियों” (परोक्ष इशारा मुसलमानों की ओर) को आदिवासियों की कीमत पर फायदा मिल रहा है।
इसके अलावा वह झामुमो के जनाधार में सेंधमारी के लिए पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन जैसे दल-बदलुओं को मैदान में उतार रही है। नतीजे ही बतायेंगे कि हेमंत सोरेन की मतदाताओं से यह विभाजनकारी चाल समझने की अपील सफल है या नहीं, लेकिन भाजपा-नीत गठबंधन की गोलबंदी से मुकाबले के लिए इंडिया ब्लॉक द्वारा, मजबूत सांगठनिक और कुशल प्रयासों के बिना, सिर्फ जबानी जमा-खर्च सत्ता बनाये रखने की कोशिशों के लिए व्यर्थ साबित है।

