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Dream of new districts in Uttarakhand: 24 वर्षों से लटकी हुई घोषणाएं और राजनीति की उलझनें

Announcements and political complications pending for 24 years

देहरादून: उत्तराखंड में नए जिलों का मुद्दा हमेशा से राजनीति का एक अहम हिस्सा रहा है। राज्य गठन के बाद से ही यह मुद्दा जनभावनाओं से जुड़ा रहा है, लेकिन हर सरकार ने इसे केवल घोषणाओं तक ही सीमित रखा। राज्य स्थापना दिवस के मौके पर इस मुद्दे को लेकर 24 सालों से चल रही राजनीति की असल तस्वीर एक बार फिर सामने आई है।

उत्तराखंड में नए जिलों की मांग सबसे पहले 2011 में उठी, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने चार जिलों के गठन की घोषणा की थी। उन्होंने गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के दो-दो जिलों की घोषणा की, जिनमें उत्तरकाशी के यमुनोत्री, पौड़ी के कोटद्वार, पिथौरागढ़ के डीडीहाट और अल्मोड़ा के रानीखेत को नए जिले बनाने का प्रस्ताव था। लेकिन यह घोषणा जल्द ही हवा में उड़ गई, क्योंकि सरकार ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

2011 में भुवन चंद्र खंडूरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस पर शासनादेश जारी हुआ, लेकिन बजट की कोई व्यवस्था नहीं की गई, जिससे यह मुद्दा फिर से अधर में लटक गया। 2012 में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जिला पुनर्गठन आयोग का गठन किया, लेकिन इस कदम से भी नए जिलों के गठन की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई।

हरीश रावत ने 2015 में 9 नए जिलों के गठन की घोषणा की और इसके लिए 100 करोड़ रुपये का बजट भी रखा, लेकिन यह भी सिर्फ एक चुनावी वादा साबित हुआ। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने सत्ता में रहते हुए इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया, लेकिन इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की।

उत्तराखंड कांग्रेस प्रवक्ता शीशपाल बिष्ट का कहना है, “कांग्रेस ने पहल की थी, लेकिन सत्ता से बाहर होते ही यह मुद्दा ठंडा पड़ गया। भाजपा ने लंबे समय तक सत्ता में रहते हुए सिर्फ लोगों को सपना दिखाया।”

नए जिलों के गठन में सबसे बड़ी रुकावट वित्तीय संकट है। राज्य की आर्थिक स्थिति को देखते हुए लाखों करोड़ों रुपये खर्च करके नए जिलों की स्थापना एक बड़ी चुनौती बन गई है। इसके अलावा, राजनीतिक दलों के लिए यह भी मुश्किल है कि अगर किसी क्षेत्र को नया जिला बनाया गया, तो दूसरे क्षेत्रों से भी यही मांग उठने लगेगी, जिससे राजनीतिक नुकसान हो सकता है।

भा.ज.पा. नेता जोत सिंह बिष्ट का कहना है, “नए जिलों के गठन के लिए संसाधनों की आवश्यकता है, और भाजपा इस पर विचार कर रही है। संसाधनों के आधार पर ही इस पर कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा।”

नए जिलों की तरह ही गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का वादा भी अधूरा ही रह गया है। उत्तराखंड एकमात्र राज्य है, जिसने 24 सालों में अपनी स्थायी राजधानी का निर्णय नहीं लिया। परिसीमन के बाद स्थिति बदलने की संभावना है, लेकिन राजनीतिक दलों का रुख अब भी साफ नहीं है।

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