भद्रराज मेला: बादलों और बारिश के बीच आस्था का महासंगम
Bhadraraj Mela: A grand confluence of faith amidst clouds and rain
मसूरी। दुधली गांव के पास भद्राज पहाड़ी रविवार को आस्था और उत्साह से सराबोर हो गई। भगवान बलराम को समर्पित वार्षिक भद्रराज मेला इस बार भी हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ का गवाह बना। सुबह की पहली किरण के साथ ही बारिश और धुंध से ढकी घाटियों में भक्तों की टोलियां मंदिर की ओर बढ़ीं। मंदिर प्रांगण में आरती और शंखनाद के साथ पूरा क्षेत्र “जय भद्रराज देव” के जयकारों से गूंज उठा।
पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा पर्व
भद्रराज मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पहाड़ की प्राचीन परंपराओं और लोककथाओं से जुड़ा है। मान्यता है कि प्राचीन काल में जब ग्रामीण अपने मवेशियों को इस क्षेत्र में चराने लाते थे, तो एक दैत्य उन्हें हानि पहुंचाता था। ग्रामीण भगवान बलराम की शरण में पहुंचे और बलराम ने राक्षस का वध कर उन्हें भयमुक्त किया। तभी से यहां उनका मंदिर स्थापित हुआ और वे भद्रराज देव के रूप में पूजे जाने लगे।
एक अन्य मान्यता के अनुसार द्वापर युग में भगवान बलराम ऋषि वेश में यहां आए थे। उस समय पशुओं में एक घातक रोग फैल गया था। बलराम ने ग्रामीणों की प्रार्थना स्वीकार कर पशुओं को रोगमुक्त किया और आशीर्वाद दिया कि कलयुग में वे यहीं निवास करेंगे।
अनुष्ठान और सांस्कृतिक झलक
मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेश नौटियाल ने बताया कि मेले में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। सुबह विशेष पूजन और दुग्धाभिषेक हुआ, जहां भक्तों ने परिवार और पशुधन की सुख-समृद्धि की कामना की।
सांस्कृतिक मंच पर जौनसारी लोकनृत्य और ढोल-दमाऊं की थाप ने माहौल को जीवंत कर दिया। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई थिरकता नजर आया। लोकगीतों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।
बारिश में भी उमड़ी श्रद्धा
दिनभर बारिश होती रही, लेकिन श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। घुमावदार पगडंडियों और बादलों से ढके जंगलों से होकर भक्त मंदिर पहुंचे। कई श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में आए, जिससे वातावरण और भी रंगीन दिखाई दिया। स्थानीय ग्रामीणों ने प्रसाद और जलपान की व्यवस्था की, वहीं छोटे दुकानों पर पहाड़ी व्यंजन और हस्तशिल्प ने मेले को लोक उत्सव का रूप दे दिया।
पर्यटन और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
भद्रराज मेला केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक और पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मसूरी और आस-पास के क्षेत्रों से पर्यटक इस आयोजन का हिस्सा बनने आते हैं। प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था का यह संगम स्थानीय व्यापारियों और हस्तशिल्पकारों के लिए आय का बड़ा जरिया बनता है।
आस्था और परंपरा का संदेश
बारिश और धुंध से घिरी वादियों में गूंजते नगाड़ों और “जय भद्रराज देव” के नारों के साथ मेला सम्पन्न हुआ। यह पर्व एक बार फिर यह संदेश दे गया कि आधुनिकता के बीच भी पहाड़ की जनता अपनी आस्था और परंपराओं से गहराई से जुड़ी है।
भद्रराज मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति, लोकसंस्कृति और सामूहिक विश्वास का अनूठा संगम है, जो समाज को एक सूत्र में बांधता है।


