पौड़ी का ‘बेड़ू’ बना ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का साधन, जल्द मिलेगा GI टैग
Pauri's 'Bedu' has become a means of livelihood for rural women, will soon get GI tag
उत्तराखंड का पारंपरिक फल पहुंचा राष्ट्रीय पहचान की ओर
पौड़ी गढ़वाल की पहाड़ियों में उगने वाला बेड़ू, जिसे पहाड़ी अंजीर भी कहा जाता है, अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रह गया है। यह पारंपरिक फल अब ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का माध्यम बन गया है। ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना के तहत इस फल से जैम और चटनी जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग देखी जा रही है। इसके चलते अब इस फल को जीआई टैग (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) दिलाने की प्रक्रिया भी तेज हो गई है।
स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं बना रहीं जैम और चटनी
पौड़ी शहर में स्थापित बेड़ू प्रसंस्करण यूनिट के जरिए स्थानीय स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं इस फल का उपयोग जैम और चटनी तैयार करने में कर रही हैं। यूनिट द्वारा स्थानीय ग्रामीणों से बेड़ू 50 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा जा रहा है। इस पहल से महिलाओं को आय का नया जरिया मिला है और वे अब परिवार की आर्थिक स्थिति में योगदान दे रही हैं।
जंगल से रसोई तक: एक फल की यात्रा
कभी बेड़ू फल केवल वन्यजीवों के भोजन या जंगल में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था, लेकिन अब यह ग्रामीण रसोइयों में स्वाद का हिस्सा बन चुका है। पहले उपेक्षित यह फल अब महिलाओं की मेहनत से एक व्यवसायिक उत्पाद में बदल चुका है, जिससे वे आत्मनिर्भर हो रही हैं।
बढ़ती मांग के बीच सहकारी समितियां भी हुईं सक्रिय
ग्रामोत्थान परियोजना के जिला प्रबंधक कुलदीप सिंह बिष्ट के अनुसार, इस साल जून तक 950 किलो बेड़ू खरीदा जा चुका है और वर्ष 2025 के लिए 2500 किलो खरीदने का लक्ष्य है। फेडरेशन द्वारा 60 रुपये प्रति किलो की दर से खरीद की जा रही है, जबकि अन्य ग्रामीणों से 50 रुपये प्रति किलो में फल लिया जा रहा है।
GI टैग से खुलेगा वैश्विक बाजार का रास्ता
बिष्ट के अनुसार, बेड़ू से बने उत्पादों को स्थानीय बाजार के साथ ही बाहरी राज्यों में भी अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। जीआई टैग मिलने से इस फल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विशिष्ट पहचान मिलेगी, जिससे मांग और मूल्य में बढ़ोतरी होगी।
महिलाओं की मेहनत से बदली ग्रामीण तस्वीर
यूनिट में तैयार बेड़ू चटनी की कीमत 160 रुपये और जैम की कीमत 150 रुपये तय की गई है। जुलाई 2024 से जून 2025 तक यूनिट ने करीब 3.75 लाख रुपये का कारोबार किया है। यह प्रयास न केवल ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक संबल दे रहा है, बल्कि पारंपरिक फल संरक्षण की दिशा में भी एक मजबूत कदम है।

