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कॉर्पोरेट की चकाचौंध छोड़ खेती की राह, देहरादून के युवा बना रहे नई पहचान

Leaving the glitz of corporate life and taking up farming, Dehradun's youth are creating a new identity

डॉ. कलाम के सपनों को कर रहे साकार

“आपका सपना सच हो, इससे पहले आपको सपना देखना होगा। यदि आप सूरज की तरह चमकना चाहते हैं, तो पहले सूरज की तरह जलें।” पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की इन पंक्तियों को देहरादून के दो युवा – ट्यूनी के जोगिंदर और चकराता सहिया के अंकित नेगी साकार कर रहे हैं। कॉर्पोरेट जगत की आकर्षक नौकरी छोड़कर उन्होंने खेती-किसानी में सफलता की नई इबारत लिखी है, जिससे अन्य युवा भी प्रेरित हो रहे हैं।

कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ ऑर्गेनिक खेती की राह

अंकित नेगी पहले एक कॉर्पोरेट कंपनी में एचआर (ह्यूमन रिसोर्स) की नौकरी कर रहे थे। ईटीवी भारत से बातचीत में उन्होंने बताया कि कोविड-19 महामारी ने उन्हें स्वास्थ्य और ऑर्गेनिक फार्मिंग की अहमियत समझाई। इस नए दृष्टिकोण के चलते उन्होंने खेती-किसानी में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया।

नए फलों की पैदावार से बढ़ा व्यापार

अंकित ने अपनी पारंपरिक नर्सरी में बदलाव लाने की ठानी। उत्तराखंड में जहां पारंपरिक फलों की खेती होती थी, वहां उन्होंने इंटरनेशनल फलों की फसलें उगाने पर जोर दिया। उन्होंने नई तकनीकों का उपयोग कर कई विदेशी फलों की पैदावार शुरू की, जिससे उनका व्यवसाय तेजी से आगे बढ़ा।

तकनीकी ज्ञान से युवा खेती को देंगे नई दिशा

अंकित नेगी का मानना है कि अगर युवा खेती के क्षेत्र में कदम रखते हैं, तो वे आधुनिक तकनीकों और नई जानकारियों का उपयोग कर उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। वर्तमान में खेती-किसानी को पारंपरिक तरीके से ही किया जा रहा है, लेकिन युवाओं की भागीदारी इसे और लाभदायक बना सकती है

जोगिंदर ने भी नौकरी छोड़ बनाई नई राह

लॉकडाउन से पहले जोगिंदर एक न्यूरो सर्जन के साथ काम कर रहे थे। लेकिन महामारी के दौरान जब उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी, तब उन्होंने अपने पारिवारिक व्यवसाय बागवानी को अपनाने का निर्णय लिया।

स्टोन फ्रूट्स की खेती से नई संभावनाएं

जोगिंदर ने पारंपरिक सेब की खेती की बजाय स्टोन फ्रूट्स (गुठलीदार फल) की ओर रुख किया। उन्होंने बताया कि स्टोन फ्रूट्स में चुलु, पुलम, खुमानी, चेरी और आड़ू जैसे फल आते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद हैं और कई बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं।

शहरों की ओर पलायन नहीं, गांव में खोजें अवसर

युवा किसान जोगिंदर का कहना है कि युवाओं को रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन नहीं करना चाहिए। उन्होंने खुद 17-18 साल तक अलग-अलग नौकरियां कीं, लेकिन उनका जुनून उन्हें वापस गांव और खेती-किसानी की ओर ले आया। उन्होंने महसूस किया कि गांवों में ही बेहतर अवसर हैं और यहां रहकर भी सफलता हासिल की जा सकती है

खेती में युवाओं की भागीदारी से बढ़ेगा भविष्य

अंकित और जोगिंदर जैसे युवा उदाहरण हैं कि सही दिशा में प्रयास किया जाए, तो खेती-किसानी को आधुनिक तकनीकों और नए विचारों से और भी लाभदायक बनाया जा सकता है। ये दोनों युवा परंपरागत खेती में नवाचार लाकर उत्तराखंड के अन्य युवाओं को भी गांवों में ही बेहतर भविष्य की राह दिखा रहे हैं

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