होली से पहले देहरादून में हर्बल गुलाल की धूम, 70 साल से रंग घोल रहा है प्रतापगढ़ का परिवार
Herbal gulal is a rage in Dehradun before Holi, a family from Pratapgarh has been mixing colours for 70 years.

देहरादून: रंगों के पर्व होली में अब महज एक सप्ताह का समय शेष है और शहर के बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। गुलाल और रंगों के व्यापारी तैयारियों में जुट गए हैं। देहरादून के झंडेवाला क्षेत्र में स्थित मैदान में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ का एक जायसवाल परिवार पिछले करीब सात दशकों से पारंपरिक तरीके से ऑर्गेनिक गुलाल तैयार कर रहा है। खास बात यह है कि यह गुलाल पूरी तरह हर्बल और सुरक्षित बताया जाता है, जिसे अरारोट और खाद्य रंगों से बनाया जाता है।
पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है व्यवसाय
परिवार के सदस्यों के अनुसार, इस काम की शुरुआत उनके दादाजी ने की थी। तब से यह परंपरा लगातार आगे बढ़ रही है और अब तीसरी पीढ़ी इस व्यवसाय को संभाल रही है। हर साल शिवरात्रि के पांचवें दिन परिवार देहरादून पहुंचता है और झंडे जी मेले की समाप्ति तक यहीं रहकर होली के लिए गुलाल और ऑर्गेनिक सिंदूर तैयार करता है।
पवन जायसवाल बताते हैं कि उनके पिता पिछले छह दशकों से अधिक समय से इस कार्य में लगे हुए हैं। पहले सीमित मात्रा में उत्पादन होता था, लेकिन अब मांग बढ़ने के कारण उत्पादन कई गुना बढ़ चुका है।
ऐसे तैयार होता है ऑर्गेनिक गुलाल
गुलाल बनाने की प्रक्रिया पारंपरिक और श्रमसाध्य है। शुद्ध अरारोट में खाद्य रंग मिलाकर उसमें हल्का पानी डाला जाता है। इसके बाद मिश्रण को बारीकी से छाना जाता है। एक बोरी गुलाल छानने में तीन से चार घंटे तक का समय लग जाता है। छानने के बाद इसे सुखाकर बोरों में भर दिया जाता है।
परिवार कुल आठ अलग-अलग रंगों का गुलाल तैयार करता है। उनका दावा है कि चूंकि इसमें खाने वाले रंगों का इस्तेमाल होता है, इसलिए त्वचा या स्वास्थ्य पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। यही कारण है कि हर्बल उत्पादों के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच इनके गुलाल की मांग साल दर साल बढ़ रही है।
भगवा रंग की बढ़ी मांग
व्यापारियों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में भगवा रंग के गुलाल की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पहले जहां पांच-छह बोरी गुलाल तैयार किया जाता था, वहीं अब मांग के अनुरूप करीब 20 बोरी तक उत्पादन किया जा रहा है।
जयप्रकाश जायसवाल का कहना है कि पिछले सात-आठ वर्षों से भगवा रंग की बिक्री लगातार बढ़ रही है। कुछ लोग इसे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से भी जोड़कर देखते हैं, लेकिन परिवार का मानना है कि भगवा रंग का धार्मिक महत्व अधिक है, इसलिए इसकी मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ी है।
पर्यावरण-अनुकूल होली पर जोर
उत्तराखंड में हर्बल और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। बीते वर्षों में स्थानीय प्रशासन और नगर निगम ने भी केमिकल युक्त रंगों से बचने के लिए अभियान चलाए थे, ताकि लोगों को त्वचा संबंधी समस्याओं और स्वास्थ्य जोखिमों से बचाया जा सके।
ऐसे में पारंपरिक और सुरक्षित तरीके से तैयार किया जा रहा यह हर्बल गुलाल न केवल कारोबार को संजीवनी दे रहा है, बल्कि लोगों को सुरक्षित और पर्यावरण-मित्र होली मनाने का विकल्प भी प्रदान कर रहा है।

