होली की तैयारियों में जुटीं विकासनगर की महिलाएं, हर्बल रंगों से सशक्तिकरण की नई कहानी
Women in Vikasnagar are busy with Holi preparations, weaving a new story of empowerment with herbal colors.
रंगों का त्योहार होली जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे उत्तराखंड के देहरादून जिले के विकासनगर क्षेत्र में इसकी रौनक भी बढ़ने लगी है। इस बार होली की तैयारियों में एक खास पहल देखने को मिल रही है। डाकपत्थर क्षेत्र में महिला स्वयं सहायता समूह की महिलाएं पूरी मेहनत और लगन के साथ हर्बल रंग तैयार कर रही हैं। इन रंगों की मांग बाजार में तेजी से बढ़ रही है और अभी तक करीब 50 किलो हर्बल रंगों की बुकिंग हो चुकी है।
होली रंगों से जुड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सव
होली केवल रंगों का त्योहार ही नहीं, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत, ऋतु परिवर्तन, वसंत के आगमन और प्रेम व भाईचारे का प्रतीक भी है। इस दिन लोग जाति-पात और भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और पुराने गिले-शिकवे भूलकर आपसी रिश्तों को मजबूत करते हैं। होली आत्मा की शुद्धि, सामाजिक सद्भाव और आपसी सौहार्द का संदेश देती है। ऐसे में होली के रंग केवल चेहरे नहीं, बल्कि दिलों को भी रंगने का काम करते हैं।
वैभव लक्ष्मी समूह की पहल बनी मिसाल
इसी सांस्कृतिक परंपरा को पर्यावरण और स्वास्थ्य के अनुकूल बनाने की दिशा में विकासनगर के डाकपत्थर क्षेत्र में ‘वैभव लक्ष्मी’ महिला स्वयं सहायता समूह सराहनीय कार्य कर रहा है। इस समूह में शामिल करीब दस महिलाएं इन दिनों होली के लिए विशेष हर्बल रंग तैयार कर रही हैं। यह महिलाएं अपने घरों से ही रोजगार से जुड़कर न केवल अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता की ओर भी कदम बढ़ा रही हैं।
वैज्ञानिक प्रशिक्षण से मिली नई पहचान
हर्बल रंगों को तैयार करने के लिए महिलाओं को कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के वैज्ञानिकों द्वारा बाकायदा प्रशिक्षण दिया गया है। कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉ. किरन पंत ने महिलाओं को प्राकृतिक संसाधनों से सुरक्षित और त्वचा के अनुकूल रंग बनाने की तकनीक सिखाई है। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने इस काम को व्यवसाय के रूप में अपनाया और आज उनकी मेहनत रंग ला रही है।
प्राकृतिक सामग्री से बन रहे सुरक्षित रंग
महिलाओं द्वारा तैयार किए जा रहे हर्बल रंग पूरी तरह प्राकृतिक हैं। इनमें पालक का रस, चुकंदर का रस, हल्दी पाउडर, गुलाब की पंखुड़ियां और अन्य प्राकृतिक तत्वों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन सभी को अरारोट में मिलाकर हाथों से रंग तैयार किए जाते हैं। अरारोट त्वचा के लिए बेहद सुरक्षित माना जाता है और इससे किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं होता। यही वजह है कि ये हर्बल रंग बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए सुरक्षित हैं।
केमिकल रंगों से बेहतर विकल्प बने हर्बल रंग
आज बाजार में केमिकल युक्त रंगों की भरमार है, जो त्वचा, आंखों और बालों के लिए नुकसानदायक साबित होते हैं। ऐसे में हर्बल रंग एक सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प बनकर सामने आए हैं। समूह की अध्यक्ष संगीता वर्मा का कहना है कि लोग अब जागरूक हो रहे हैं और केमिकल रंगों की बजाय हर्बल रंगों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसी बढ़ती जागरूकता का परिणाम है कि इस बार होली से करीब एक महीना पहले ही 50 किलो हर्बल रंगों की डिमांड मिल चुकी है।
पिछले साल भी रही थी जबरदस्त मांग
वैभव लक्ष्मी समूह के लिए यह पहला मौका नहीं है। पिछले साल होली के दौरान समूह ने करीब एक क्विंटल हर्बल रंगों की मांग पूरी की थी। इस सफलता ने महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाया और इस साल वे पहले से ज्यादा तैयारी के साथ मैदान में उतरी हैं। महिलाएं हर दिन कड़ी मेहनत कर रही हैं ताकि समय पर बाजार की मांग को पूरा किया जा सके।
अलग-अलग पैकिंग में बाजार में उतारे जाएंगे रंग
ग्राहकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए हर्बल रंगों की पैकेजिंग भी अलग-अलग मात्रा में की जा रही है। रंगों को 50 ग्राम, 100 ग्राम और 250 ग्राम के पैकेट में बाजार में उतारा जाएगा। इससे हर वर्ग के लोग अपनी जरूरत और बजट के अनुसार हर्बल रंग खरीद सकेंगे।
महिला सशक्तिकरण की मजबूत मिसाल
कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉ. किरन पंत का कहना है कि महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए लगातार रोजगार उन्मुखी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। हर्बल कलर प्रोग्राम भी उसी का एक हिस्सा है, जिसकी आज काफी मांग है। पूरे क्षेत्र में करीब 700 लोग विभिन्न स्वयं सहायता समूहों से जुड़े हुए हैं और उन्हें समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
रंगों के साथ आत्मनिर्भरता की खुशबू
विकासनगर की इन महिलाओं द्वारा तैयार किए जा रहे हर्बल रंग सिर्फ होली को सुरक्षित और खुशनुमा नहीं बना रहे, बल्कि महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी एक मजबूत कदम साबित हो रहे हैं। यह पहल दिखाती है कि अगर सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो महिलाएं घर बैठे भी अपने हुनर से पहचान बना सकती हैं और समाज में बदलाव की रंगीन तस्वीर पेश कर सकती हैं।



