उत्तराखंड

विकास बनाम पर्यावरण की बहस पर विराम? उत्तराखंड में सड़कों के निर्माण के पीछे की पूरी तस्वीर

An end to the development vs. environment debate? The complete picture behind road construction in Uttarakhand.

देहरादून: उत्तराखंड में विकास कार्यों, खासकर सड़क निर्माण को लेकर आमतौर पर यह धारणा बनी रहती है कि इसके नाम पर जंगलों का बड़े पैमाने पर विनाश किया जा रहा है। लोगों का मानना है कि सड़कों के लिए अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। हालांकि, हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल और संतुलित बताई जा रही है। सरकारी विभागों का दावा है कि किसी भी सड़क परियोजना को मंजूरी देने से पहले पर्यावरणीय पहलुओं पर गहन मंथन किया जाता है और पेड़ों को बचाने की हर संभव कोशिश की जाती है।

सड़क निर्माण से पहले होता है विस्तृत होमवर्क

पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड में करीब 200 किलोमीटर नई सड़कों का निर्माण हुआ है, जिसके लिए लगभग 128 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया गया। यही आंकड़े लोगों के मन में “विकास के लिए विनाश” की सोच को मजबूत करते हैं। लेकिन लोक निर्माण विभाग (PWD) का कहना है कि किसी भी सड़क परियोजना में सबसे पहले ऐसे एलाइनमेंट को चुना जाता है, जहां पेड़ों की संख्या न्यूनतम हो।

PWD सचिव पंकज पांडे बताते हैं कि सड़क निर्माण के दौरान उनकी प्राथमिकता पर्यावरणीय क्षति को कम से कम रखने की होती है। उनका कहना है कि पेड़ों की कटाई विभाग के लिए भी एक भावनात्मक विषय है और इसे अंतिम विकल्प के तौर पर ही अपनाया जाता है।

गंगोत्री हाईवे बना उदाहरण

PWD सचिव ने गंगोत्री हाईवे का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां 12 मीटर चौड़ी सड़क की डीपीआर स्वीकृत थी, लेकिन जमीनी हालात को देखते हुए चौड़ाई एक मीटर कम कर 11 मीटर कर दी गई। इस छोटे से बदलाव से करीब एक हजार पेड़ों को कटने से बचा लिया गया। विभाग का दावा है कि विशेष प्रजातियों जैसे देवदार, बुरांश और बांज के पेड़ों को बचाने का विशेष ध्यान रखा जाता है, सिवाय उन परिस्थितियों के जहां राष्ट्रीय सुरक्षा या सीमा से जुड़े प्रोजेक्ट हों।

नुकसान की दोगुनी भरपाई का दावा

सरकारी नियमों के अनुसार, यदि किसी परियोजना में वन भूमि का उपयोग अपरिहार्य हो जाता है, तो जितनी भूमि ली जाती है, उसकी दोगुनी भूमि वन विभाग को क्षतिपूर्ति के रूप में दी जाती है। इसके साथ ही कटे हुए पेड़ों के बदले दोगुने पेड़ लगाने के लिए आर्थिक मुआवजा भी दिया जाता है।

आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में PWD ने सड़कों के निर्माण के लिए वन विभाग को कुल 66.40 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति राशि दी है और 256 हेक्टेयर से अधिक भूमि वृक्षारोपण के लिए उपलब्ध कराई गई है।

वन विभाग का पक्ष और फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट

प्रमुख वन संरक्षक रंजन कुमार मिश्र का कहना है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है। पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों को सड़क, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं देना जरूरी है। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट लागू किया गया है।

उन्होंने बताया कि हर परियोजना में वन भूमि के न्यूनतम उपयोग, वन्यजीवों की सुरक्षा और क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण को अनिवार्य किया जाता है। राज्य में वृक्षारोपण के लिए लैंड बैंक भी तैयार किया गया है, ताकि भविष्य में भूमि की कमी न हो।

45 साल में दोगुना हुआ वृक्षारोपण

पिछले 45 वर्षों में उत्तराखंड में करीब 43 हजार हेक्टेयर वन भूमि विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल हुई, जबकि इसके बदले 86 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण किया गया। आज राज्य की कुल भूमि का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जो देश में सबसे अधिक वन आच्छादन वाले राज्यों में शामिल है।

सरकारी दावों के मुताबिक, उत्तराखंड में विकास की गाड़ी को आगे बढ़ाते हुए पर्यावरण संतुलन बनाए रखने की कोशिश लगातार जारी है, हालांकि इस पर बहस और सवाल भविष्य में भी बने रहेंगे।

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