उत्तराखंड के कोटद्वार में कभी था गैंडों का बसेरा? 200 साल पुराना इतिहास सामने लाए वन्यजीव विशेषज्ञ रजा काजमी
Did rhinoceroses once inhabit Kotdwar, Uttarakhand? Wildlife expert Raza Kazmi reveals 200-year-old history.
Corbett National Park News: उत्तराखंड की पहचान आज बाघों, हाथियों और समृद्ध वन्यजीवों के लिए होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस प्रदेश की तराई में कभी गैंडे भी विचरण करते थे? कॉर्बेट टाइगर रिजर्व पहुंचे प्रसिद्ध लेखक और वन्यजीव विशेषज्ञ रजा काजमी ने गैंडों से जुड़ा करीब 200 साल पुराना इतिहास साझा किया है। उनके मुताबिक, ब्रिटिश काल में कोटद्वार क्षेत्र में गैंडे को देखने और उसका चित्र बनाने की एक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख मिलता है। यह जानकारी उत्तराखंड के वन्यजीव इतिहास के एक ऐसे पहलू को सामने लाती है, जिसके बारे में आज बहुत कम चर्चा होती है।
कोटद्वार में गैंडे को देखकर हैरान रह गए थे ब्रिटिश चित्रकार
रजा काजमी के अनुसार, करीब दो शताब्दी पहले ब्रिटिश चित्रकार थॉमस डेनियल और उनके भतीजे विलियम डेनियल भारत के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा कर रहे थे। इस दौरान वे यहां के प्राकृतिक नजारों, भौगोलिक परिस्थितियों और वन्यजीवों को चित्रों के माध्यम से दर्ज कर रहे थे।
इसी यात्रा के दौरान दोनों चित्रकार कोटद्वार क्षेत्र पहुंचे। यहां एक नदी के किनारे उन्हें गैंडा पानी पीते हुए दिखाई दिया। बताया जाता है कि वे इस विशाल वन्यजीव को देखने के लिए उसके काफी करीब गए और उसका स्केच तैयार किया। बाद में इसी रेखाचित्र के आधार पर गैंडे की पेंटिंग बनाई गई।
काजमी ने इस घटना का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय गैंडे को वहां से हटाने के लिए गोली भी चलाई गई थी। यह प्रसंग संकेत देता है कि उस दौर में उत्तराखंड की तराई में गैंडों की मौजूदगी रही हो सकती है।
कभी गैंडों का दायरा उत्तराखंड से भी आगे तक था
आज भारत में गैंडों का नाम आते ही असम, उत्तर बंगाल और उत्तर प्रदेश के दुधवा जैसे क्षेत्रों का जिक्र होता है। नेपाल के कुछ हिस्सों में भी गैंडे पाए जाते हैं। हालांकि, ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि अतीत में इस वन्यजीव का भौगोलिक विस्तार मौजूदा क्षेत्रों से कहीं अधिक व्यापक था।
रजा काजमी के मुताबिक, पश्चिमी हिमालय की तराई में हिमाचल प्रदेश के सिरमौर क्षेत्र तक गैंडों की मौजूदगी के संदर्भ मिलते हैं। इससे भी पुराने मुगलकालीन दस्तावेजों में पेशावर क्षेत्र तक गैंडों के पाए जाने का उल्लेख बताया जाता है। समय के साथ प्राकृतिक आवास में बदलाव और मानवीय गतिविधियों सहित विभिन्न कारणों से गैंडों का दायरा सिमटता गया।
कॉर्बेट क्षेत्र की जैव विविधता को समझने में मददगार है इतिहास
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और उसके आसपास का इलाका वन्यजीवों की विविधता के लिए जाना जाता है। यहां बाघ, हाथी, हिरण और पक्षियों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। ऐसे में कोटद्वार में गैंडे की ऐतिहासिक मौजूदगी से जुड़ा विवरण इस क्षेत्र के पुराने पारिस्थितिक स्वरूप को समझने का एक नया नजरिया देता है।
हालांकि, करीब 200 साल पुराने चित्र और ऐतिहासिक उल्लेख अपने समय की महत्वपूर्ण झलक जरूर पेश करते हैं, लेकिन इनसे वर्तमान में उत्तराखंड में गैंडों की मौजूदगी साबित नहीं होती। इस जानकारी का महत्व प्रदेश के वन्यजीव इतिहास और अतीत में प्रजातियों के भौगोलिक विस्तार को समझने में है।
रजा काजमी द्वारा साझा किया गया यह प्रसंग याद दिलाता है कि उत्तराखंड के जंगलों का इतिहास आज दिखाई देने वाले वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। यहां की धरती अतीत में किन-किन प्रजातियों का घर रही होगी, इसे समझने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों और वन्यजीव अभिलेखों का अध्ययन भी बेहद जरूरी है।
