उत्तराखंड

Cabinet Proposal: उत्तराखंड में Cabinet Proposal पर सवाल, बिना हस्ताक्षर के भेजे जा रहे अहम प्रस्ता!

Cabinet Proposal: Questions Raised Over Cabinet Proposals in Uttarakhand—Key Proposals Being Dispatched Without Signatures!

उत्तराखंड शासन की निर्णय प्रक्रिया पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य मंत्रिमंडल के सामने रखे जाने वाले महत्वपूर्ण Cabinet Proposal तैयार करने में लगातार लापरवाही सामने आ रही है। कई मामलों में प्रस्ताव बिना संबंधित मंत्री और विभागीय सचिव के हस्ताक्षर के ही आगे भेज दिए गए। इतना ही नहीं, कई Cabinet Proposal समय पर कैबिनेट पोर्टल पर अपलोड नहीं किए गए और कुछ प्रस्ताव बिना विधिक परीक्षण तथा परामर्शी विभागों की सहमति के ही मंत्रिमंडल तक पहुंच गए।

इन अनियमितताओं को देखते हुए मुख्य सचिव आनंद वर्धन को एक बार फिर सभी विभागों को कड़ा पत्र जारी करना पड़ा है। इससे स्पष्ट है कि पहले जारी निर्देशों के बावजूद शासन स्तर पर अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है।

Cabinet Proposal पर मुख्य सचिव की बढ़ती चिंता

राज्य सरकार के बड़े फैसलों की नींव Cabinet Proposal पर ही आधारित होती है। इन्हीं प्रस्तावों के आधार पर मुख्यमंत्री और मंत्री महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेते हैं। ऐसे में यदि प्रस्ताव अधूरे, त्रुटिपूर्ण या बिना अनुमोदन के तैयार किए जाएं तो इससे पूरी निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

मुख्य सचिव कार्यालय ने पाया कि कई विभाग अभी भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं। यही कारण है कि दोबारा निर्देश जारी कर दस प्रमुख कमियों को तत्काल दूर करने को कहा गया है।

बिना मंत्री और सचिव के हस्ताक्षर के भेजे गए Cabinet Proposal

सबसे गंभीर अनियमितता यह सामने आई कि कई Cabinet Proposal पर संबंधित मंत्री और विभागीय सचिव के हस्ताक्षर तक नहीं थे। प्रशासनिक दृष्टि से यह बेहद गंभीर मामला माना जा रहा है, क्योंकि बिना औपचारिक स्वीकृति के ऐसे प्रस्तावों को आगे बढ़ाना नियमों की अनदेखी है।

इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या विभागीय अधिकारी निर्णय प्रक्रिया की संवेदनशीलता को पर्याप्त गंभीरता से ले रहे हैं।

समय पर पोर्टल पर अपलोड नहीं हो रहे प्रस्ताव

सरकारी नियमों के अनुसार प्रत्येक Cabinet Proposal को कैबिनेट बैठक से कम से कम सात दिन पहले मंत्री परिषद विभाग को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इससे संबंधित विभागों और परामर्शी इकाइयों को प्रस्ताव की जांच और आवश्यक संशोधन का पर्याप्त समय मिल सके।

लेकिन कई विभाग अंतिम समय में प्रस्ताव भेज रहे हैं, जिसके कारण उनका समुचित परीक्षण नहीं हो पाता और त्रुटियां यथावत बनी रहती हैं।

बिना परामर्शी विभागों की सहमति के भी आगे बढ़े मामले

मुख्य सचिव के संज्ञान में ऐसे मामले भी आए हैं, जहां Cabinet Proposal संबंधित परामर्शी विभागों की सहमति के बिना ही तैयार कर दिए गए। किसी भी बड़े प्रशासनिक निर्णय से पहले वित्त, विधि और अन्य संबंधित विभागों की राय लेना अनिवार्य होता है। इस प्रक्रिया की अनदेखी से भविष्य में प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।

विधिक परीक्षण के बिना रखे जा रहे दस्तावेज

कई प्रस्तावों के साथ संलग्न नियमावली, संशोधन और विधेयक बिना विधिक परीक्षण के ही प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यदि ऐसे Cabinet Proposal पर निर्णय ले लिया जाए तो बाद में न्यायालयों में चुनौती की स्थिति बन सकती है। इसी कारण मुख्य सचिव ने कानूनी परीक्षण को अनिवार्य रूप से पूरा करने के निर्देश दिए हैं।

मुख्यमंत्री और मंत्रियों की नाराजगी के बावजूद जारी लापरवाही

सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री और कई मंत्री पूर्व में भी त्रुटिपूर्ण Cabinet Proposal पर नाराजगी जता चुके हैं। कैबिनेट बैठकों में अधिकारियों को प्रक्रिया में सुधार के निर्देश दिए गए थे।

इसके बावजूद बार-बार एक जैसी कमियां सामने आना शासन के भीतर समन्वय, जवाबदेही और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

शासन की साख पर पड़ सकता है असर

कैबिनेट में जाने वाले प्रस्ताव राज्य की नीतियों और विकास योजनाओं की दिशा तय करते हैं। यदि Cabinet Proposal की तैयारी में ही गंभीरता नहीं बरती जाएगी तो न केवल निर्णय प्रक्रिया प्रभावित होगी, बल्कि शासन की विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने के लिए प्रस्तावों की तैयारी में पारदर्शिता, समयबद्धता और जवाबदेही अत्यंत आवश्यक है।

अब सबकी नजर मुख्य सचिव के नए निर्देशों पर

मुख्य सचिव द्वारा दोबारा जारी किए गए निर्देशों के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभागीय अधिकारी अपनी कार्यशैली में कितना सुधार लाते हैं। यदि इस बार भी स्थिति नहीं बदली तो भविष्य में और सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल इतना तय है कि Cabinet Proposal से जुड़ी ये अनियमितताएं उत्तराखंड शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर बहस को जन्म दे रही हैं।

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