उत्तराखंड

Dehradun Fossil Discovery: देहरादून के मोहंड में मिलीं 45 लाख साल पुरानी मछलियां, हिमालयी इतिहास की बड़ी खोज

Dehradun Fossil Discovery: 4.5 million-year-old fish found in Mohand, Dehradun, a major discovery in Himalayan history.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की सीमा पर स्थित ‘मोहंड’ (Mohand) क्षेत्र इन दिनों वैश्विक भू-वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG) के वैज्ञानिकों ने यहाँ एक ऐसी खोज की है, जो हिमालय के निर्माण और उस समय के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के बारे में हमारी समझ को पूरी तरह बदल सकती है। वैज्ञानिकों को मोहंड के शिवालिक तलछट में करीब 45 से 50 लाख वर्ष पुराने ‘प्लायोसीन काल’ (Pliocene Epoch) के मीठे पानी की मछलियों के जीवाश्म मिले हैं।

वाडिया संस्थान की बड़ी उपलब्धि

यह महत्वपूर्ण शोध वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक निंगथौजम प्रेमजीत सिंह और उनकी टीम द्वारा किया गया है। इस खोज ने न केवल हिमालयी क्षेत्र के प्राचीन जलजीवन को उजागर किया है, बल्कि यह भी साबित किया है कि लाखों साल पहले इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति आज के मुकाबले काफी भिन्न थी।

मछली के ‘कान’ से खुला इतिहास का द्वार

इस शोध की सबसे अनोखी और तकनीकी बात यह है कि वैज्ञानिकों को मछलियों की पूरी हड्डियाँ नहीं, बल्कि उनके ‘ओटोलिथ’ (Otolith) मिले हैं।

  • क्या है ओटोलिथ? आम भाषा में इसे मछली के कान के भीतर मौजूद एक छोटी कैल्शियम संरचना कहा जा सकता है। यह मछली को पानी के भीतर संतुलन बनाए रखने और सुनने में मदद करती है।

  • वैज्ञानिक महत्व: ओटोलिथ की संरचना से यह पता लगाया जा सकता है कि मछली किस प्रजाति की थी, उस समय पानी का तापमान क्या था और वह जलाशय कितना पुराना था।

500 किलो तलछट से निकले 36 अनमोल जीवाश्म

जीवाश्मों तक पहुँचने की यह डगर आसान नहीं थी। वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों ने मोहंड के शिवालिक क्षेत्र से लगभग 500 किलोग्राम तलछट (सेडीमेंट) इकट्ठा किया। लैब में घंटों चले बारीक विश्लेषण और छनाई के बाद, वैज्ञानिकों के हाथ कुल 36 जीवाश्म लगे। ये जीवाश्म उस कालखंड की गवाही दे रहे हैं जब हिमालय अपनी युवावस्था में था।

आज की ‘सोल’ का प्राचीन रूप

खोजे गए जीवाश्मों में सबसे प्रमुख प्रजाति ‘चन्ना’ (Channa) पाई गई है, जिसे बोलचाल की भाषा में स्नेकहेड फिश या ‘सोल’ मछली कहा जाता है।

  • शिकारी मछली: स्नेकहेड मछली आज भी भारत की नदियों और तालाबों में बहुतायत में पाई जाती है। यह एक ‘शीर्ष शिकारी’ (Top Predator) मानी जाती है।

  • अनुकूलन: इस मछली का जीवाश्म मिलना यह दर्शाता है कि लाखों साल पहले भी यह प्रजाति यहाँ के जलजीवन पर राज करती थी।

क्या कहती है यह खोज?

मोहंड में मीठे पानी की मछलियों के अवशेष मिलना कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक निष्कर्षों की ओर इशारा करते हैं:

  1. स्थिर जलाशय की मौजूदगी: स्नेकहेड जैसी मछलियाँ आमतौर पर शांत झील, तालाब या ठहरे हुए जलाशयों में रहना पसंद करती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि 45 लाख साल पहले मोहंड और शिवालिक के इस क्षेत्र में विशाल झीलें या शांत जलधाराएं मौजूद थीं।

  2. जलवायु का संकेत: प्लायोसीन काल के दौरान यहाँ का मौसम आर्द्र (Humid) और गर्म रहा होगा, जो मीठे पानी के जीवों के पनपने के लिए अनुकूल था।

  3. हिमालयी उत्थान: यह खोज शिवालिक पहाड़ियों के क्रमिक उत्थान और वहां की नदियों के मार्ग बदलने के इतिहास को समझने में मदद करेगी।

खोज का संक्षिप्त विवरण 

विवरण जानकारी
खोज का स्थान मोहंड क्षेत्र (देहरादून-सहारनपुर सीमा)
जीवाश्म की आयु 45 से 50 लाख वर्ष (प्लायोसीन काल)
मुख्य प्रजाति चन्ना (स्नेकहेड फिश / सोल)
प्रमुख साक्ष्य ओटोलिथ (मछली के कान की हड्डियाँ)
संस्थान वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG)

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