उत्तराखंड

Plastic Free Corbett Campaign: कॉर्बेट के फाटो जोन में महिलाओं का ‘जूट मैजिक’, 3 साल में कमाए 24 लाख, जूट बैग ने प्लास्टिक को किया पूरी तरह रिप्लेस

Plastic-Free Corbett Campaign: Women in Corbett's Phato Zone created 'jute magic', earning 2.4 million rupees in three years, jute bags replaced plastic bags.

विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) अपनी जैव विविधता और बाघों की दहाड़ के लिए जाना जाता है, लेकिन आज इसकी एक नई पहचान ‘नारी शक्ति’ और ‘पर्यावरण संरक्षण’ के संगम के रूप में उभर रही है। कॉर्बेट से सटे तराई पश्चिमी वन प्रभाग के फाटो जोन (Phanto Zone) में मालधन क्षेत्र की महिलाओं ने एक अनूठी मिसाल पेश की है। यहाँ की ग्रामीण महिलाओं ने जूट के बैग बनाकर न केवल प्लास्टिक के प्रदूषण पर लगाम लगाई है, बल्कि अपने लिए स्वरोजगार का एक ऐसा ठोस जरिया भी बनाया है, जिससे वे आर्थिक रूप से पूरी तरह सशक्त हो गई हैं।

घर की चौखट से बाजार तक का सफर

रामनगर के मालधन क्षेत्र में रहने वाली महिलाएं, जो कभी केवल घर के चूल्हे-चौके तक सीमित थीं, आज ‘शिव स्वयं सहायता समूह’ के माध्यम से उद्यमी बन चुकी हैं। पिछले तीन वर्षों से ये महिलाएं जूट के आकर्षक बैग तैयार कर रही हैं। इन महिलाओं की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इन्होंने अपने दैनिक कामकाज के बाद बचे हुए खाली समय को ‘धन’ में बदलना सीख लिया है।

इन जूट बैग्स का उपयोग फाटो जोन में आने वाले पर्यटकों के लिए ‘गार्बेज बैग’ (Garbage Bag) के रूप में अनिवार्य कर दिया गया है। सफारी पर जाने वाले पर्यटकों को प्लास्टिक की थैलियों के बजाय ये जूट बैग दिए जाते हैं, ताकि वे अपना कूड़ा-कचरा जंगल में न फेंकें।

इको-टूरिज्म और रोजगार का नया केंद्र

साल 2021 में तराई पश्चिमी वन प्रभाग के अंतर्गत फाटो जोन को इको-टूरिज्म के रूप में विकसित किया गया था। साल 2022 से यहाँ पर्यटन गतिविधियों ने रफ्तार पकड़ी।

  • सफारी का संचालन: वर्तमान में यहाँ प्रतिदिन सुबह और शाम की पालियों में 50-50 जिप्सियों (कुल 100 जिप्सियां) के संचालन की अनुमति है।

  • स्थानीय भागीदारी: पर्यटन बढ़ने के साथ ही गाइड, ड्राइवर और होटल व्यवसाय के साथ-साथ स्थानीय महिला समूहों को भी सीधा लाभ मिलने लगा है।

3 साल में 24 लाख का टर्नओवर

महिला समूह की मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले तीन वर्षों में इन महिलाओं ने जूट बैग बेचकर लगभग 24 लाख रुपये की आय अर्जित की है। यह राशि न केवल उनके घरों की आर्थिक स्थिति सुधार रही है, बल्कि बच्चों की शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी मददगार साबित हो रही है। जूट बैग के इस मॉडल ने साबित कर दिया है कि यदि पर्यटन को स्थानीय समुदायों से जोड़ा जाए, तो पलायन जैसी समस्याओं को जड़ से खत्म किया जा सकता है।

प्लास्टिक का ‘दुश्मन’ और पर्यावरण का ‘दोस्त’

तराई पश्चिमी वन प्रभाग के डीएफओ प्रकाश आर्या के अनुसार, जंगल में प्लास्टिक का प्रवेश एक बड़ी चुनौती रही है। जूट बैग्स ने प्लास्टिक को पूरी तरह रिप्लेस कर दिया है।

  1. स्थायित्व: जूट के बैग मजबूत होते हैं और लंबे समय तक चलते हैं।

  2. बायोडिग्रेडेबल: जूट पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है। यदि यह गलती से जंगल में रह भी जाए, तो मिट्टी में मिलकर खाद बन जाता है, जबकि प्लास्टिक हजारों सालों तक वन्यजीवों के लिए खतरा बना रहता है।

आत्मनिर्भरता से घटा पलायन का दर्द

उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में रोजगार का अभाव अक्सर युवाओं को शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर करता है। लेकिन फाटो जोन के इस ‘इको-टूरिज्म मॉडल’ ने महिलाओं को घर बैठे काम दिया है। अब महिलाओं को काम की तलाश में बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। वे अपने परिवार के साथ रहते हुए सम्मानजनक आय प्राप्त कर रही हैं।

ब्रांड बनेगा ‘मालधन जूट’

सफलता के इस पहले चरण के बाद, अब विभाग और महिला समूह इन बैग्स को और अधिक रचनात्मक बनाने पर विचार कर रहे हैं। आने वाले समय में इन बैग्स पर वन्यजीवों के चित्र और स्लोगन छापे जाएंगे, ताकि पर्यटक इन्हें ‘सोवेनियर’ (यादगार) के तौर पर भी अपने साथ घर ले जा सकें। इससे महिलाओं की आय में और अधिक वृद्धि होने की संभावना है।

फाटो जोन जूट प्रोजेक्ट

विवरण सांख्यिकी / जानकारी
समूह का नाम शिव स्वयं सहायता समूह (मालधन)
मुख्य उत्पाद जूट गार्बेज बैग
कुल आय (3 वर्ष) ₹24 लाख (लगभग)
सफारी क्षमता 100 जिप्सियां प्रतिदिन
मुख्य उद्देश्य प्लास्टिक मुक्त पर्यटन और महिला सशक्तिकरण
प्रारंभ वर्ष 2022 (सफारी संचालन)

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