“केदारनाथ उपचुनाव बीजेपी और कांग्रेस के लिए बनी साख की लड़ाई”
" 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का "बाबा केदारनाथ" को लेकर विशेष ध्यान रहा है।

देहरादून: (एजेंसी)केदारनाथ विधानसभा सीट भाजपा विधायक शैला रानी रावत के निधन के बाद खाली हुई है। इस सीट पर अब तक पांच बार चुनाव हुए हैं, जिसमें बीजेपी तीन बार और कांग्रेस ने दो बार जीत हासिल की है. इसी पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने रही है. इस बार भी बीजेपी और कांग्रेस की सीधी टक्कर है. ऐसे में ये देखने वाली बात होगी कि अबकी बार बाजी किसके हाथ लगेगी।

वाराणसी लोकसभा सीट के बाद केदारनाथ विधानसभा उपचुनाव की एक ऐसी सीट है जिस पर मुख्यमंत्री की राजनीति से लेकर देश के प्रधानमंत्री की आस्था तक इस विधानसभा सीट पर जुड़ी हुई है। 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्रमदी का बाबा केदारनाथ को लेकर विशेष ध्यान रहा है। अयोध्या और बद्रीनाथ में हुए चुनाव के बाद सबकी नजर केदारनाथ विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव पर टिकी हुई है. भारतीय जनता पार्टी के लिए केदारनाथ उपचुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है तो कांग्रेस इस चुनाव को जीतकर अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन फिर से वापस करना चाहती है. यही वजह है केदारनाथ उपचुनाव के लिए बीजेपी और कांग्रेस एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं।
केदारनाथ उपचुनाव मैं दोनों पार्टियों की कांटे की टक्कर
20 नवंबर को केदारनाथ विधानसभा उपचुनाव के लिए मतदान होना है उससे पहले बीजेपी और कांग्रेस के प्रत्याशी न सिर्फ जनता के दर पर जा रहे हैं बल्कि भगवान की चौखट पर भी चुनाव में जितने का आशीर्वाद लेने जा रहे हैं. केदारनाथ सीट पर बीजेपी और कांग्रेस में सीधी टक्कर है।

कांग्रेस से पूर्व विधायक मनोज रावत तो बीजेपी से पूर्व विधायक आशा नौटियाल केदारनाथ के चुनावी मैदान में आमने-सामने है केदारनाथ विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा है, ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि कौन सी पार्टी वोटर्स को लुभाने में कामयाब रहेगी। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी पार्टी नेताओं की टोली लेकर ऐश्वर्य के घर पहुंच गए। दोनों दलों का मकसद कांग्रेस और भाजपा में रहीं शैलारानी के उस वोट बैंक को साधने की है, जो दलीय विचार से इतर उनके व्यक्तिगत संबंधों के कारण उनके पीछे चला। केदारनाथ विधानसभा उपचुनाव एक ऐसा चुनाव है। जिसकी हार और जीत का असर दोनों पार्टियों की राजनीति का प्रदेश से लेकर देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा।
BJP के लिए केदारनाथ का उपचुनाव उसकी प्रतिष्ठा से जुड़ा है और उसके सामने अपनी इस सीट को बचाए रखने की चुनौती है. वहीं कांग्रेस भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है.


