उत्तराखंड

अल्मोड़ा का ऐतिहासिक नंदा देवी मेला संपन्न: मां नंदा-सुनंदा की शोभायात्रा ने भरा आस्था का रंग

Almora's historic Nanda Devi fair concluded: Mother Nanda-Sunanda's procession filled the color of faith

अल्मोड़ा: उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी कहलाने वाले अल्मोड़ा में बुधवार को नंदा देवी महोत्सव का समापन हुआ। मां नंदा-सुनंदा की भव्य शोभायात्रा और विसर्जन के साथ नगर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा। गली-गली में जयकारों की गूंज सुनाई दी और दूर-दराज से आए हजारों श्रद्धालुओं ने मां के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।


शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब

दोपहर बाद नंदा देवी मंदिर से मां नंदा-सुनंदा का डोला निकाला गया। यह डोला लाला बाजार, बंसल गली, माल रोड और जीजीआईसी स्थित मंदिर होते हुए पूरे नगर में घूमा। माल रोड पर भव्य आरती के बाद यह शोभायात्रा सीढ़ी बाजार, कचहरी बाजार और थाना बाजार से होती हुई दुगालखोला पहुंची। यहां नौला स्थल पर प्रतिमाओं का विधिवत विसर्जन किया गया। इस दौरान जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा की और पूरा वातावरण जयकारों से गूंज उठा।


धार्मिक परंपराओं का अनूठा संगम

नंदा देवी मेला हर साल भाद्र मास की पंचमी से दशमी तक मनाया जाता है। षष्ठी के दिन विशेष विधि से कदली वृक्षों को आमंत्रित किया जाता है और सप्तमी की सुबह इन्हें मंदिर में लाकर स्थानीय कलाकार मां नंदा और सुनंदा की प्रतिमाएं गढ़ते हैं। अष्टमी और नवमी को विशेष पूजा-अर्चना होती है और दशमी के दिन नगर में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था बल्कि कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवित रखती है।


विदाई का भावुक क्षण

विसर्जन का पल श्रद्धालुओं के लिए बेहद भावुक होता है। यहां मां की प्रतिमाओं की विदाई को बेटी की ससुराल विदाई की तरह माना जाता है। लोग आंसुओं और भावनाओं से भरे जयकारों के बीच मां को विदा करते हैं और पुनः मंदिर लौटकर पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद की कामना करते हैं।


ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

यह मेला चंद वंश के शासनकाल से लगातार आयोजित किया जा रहा है। तभी से इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष स्थान प्राप्त है। आज भी चंद वंश के वंशज विशेष पूजा में शामिल होते हैं। न केवल अल्मोड़ा बल्कि पूरे कुमाऊं और देशभर से श्रद्धालु इस मेले में शामिल होते हैं।


आस्था और संस्कृति का अद्वितीय संगम

कुमाऊं के लोग मां नंदा-सुनंदा को अपनी कुलदेवी मानते हैं। यही कारण है कि इस मेले से हर घर-परिवार का गहरा भावनात्मक जुड़ाव है। भजन-कीर्तन, लोकगीत, पारंपरिक वाद्य और झांकियों ने इस आयोजन को और भी भव्य बना दिया। वहीं स्थानीय बाजारों की रौनक ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी।

नंदा देवी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, परंपरा और संस्कृति का प्रतीक है। मां नंदा-सुनंदा की शोभायात्रा और विसर्जन ने श्रद्धालुओं की भावनाओं को गहराई से छुआ और यह संदेश दिया कि आस्था और संस्कृति मिलकर समाज को जोड़ने की ताकत रखते हैं।

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