Land Acquisition Compensation: NH-74 भूमि अधिग्रहण मामला, हाईकोर्ट से याचिकाकर्ताओं को लगा बड़ा झटका, मुआवजा बढ़ाने की मांग पर जिला अदालत जाने का निर्देश
Land Acquisition Compensation: NH-74 land acquisition case, Petitioners suffer major setback from High Court, directed to approach district court seeking enhanced compensation
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 74 (NH-74) के चौड़ीकरण के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण के मुआवजे का विवाद एक बार फिर चर्चा में है। नैनीताल हाईकोर्ट ने इस मामले में मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग कर रहे डेढ़ दर्जन से अधिक काश्तकारों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि सीधे हाईकोर्ट में रिट याचिका के माध्यम से राहत पाना कानूनी रूप से संभव नहीं है, यदि कानून में पहले से ही वैकल्पिक उपाय मौजूद हों।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद काशीपुर से सितारगंज के बीच NH-74 के चौड़ीकरण के लिए अधिग्रहित की गई भूमि से जुड़ा है। वर्ष 2015 और 2017 के दौरान सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) ने भूमि अधिग्रहण के बदले मुआवजे के ‘अवार्ड’ (Award) पारित किए थे। याचिकाकर्ता श्रवण सिंह, जसवीर सिंह और राजेंद्र कुमार सहित कई अन्य किसानों का तर्क था कि उन्हें उनकी भूमि का उचित मूल्य नहीं मिला है।
इन याचिकाकर्ताओं ने लगभग सात साल की देरी के बाद मुआवजा वृद्धि के लिए आवेदन किया था, जिसे उधम सिंह नगर के जिलाधिकारी (कलेक्टर) ने ‘समय सीमा’ (Limitation Period) के आधार पर खारिज कर दिया था। इसी आदेश को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता हाईकोर्ट पहुंचे थे।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: वैकल्पिक कानूनी उपाय का पालन जरूरी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास ‘मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996’ (Arbitration and Conciliation Act) की धारा 34 के तहत जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील करने का एक स्पष्ट वैधानिक विकल्प उपलब्ध है। चूंकि कानून में जिला अदालत जाने का उपचार पहले से मौजूद है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सीधे उच्च न्यायालय में दायर रिट याचिकाएं विचारणीय नहीं मानी जा सकतीं।
अदालत ने तकनीकी आधार पर उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें देरी के कारण जिलाधिकारी द्वारा खारिज किए गए आवेदनों को चुनौती दी गई थी।
समय सीमा पर कानूनी बहस
कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दलील दी कि ‘राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम’ (National Highways Act) में मुआवजा वृद्धि के लिए आवेदन करने की कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि वित्तीय तंगी और कानूनी जानकारी के अभाव के कारण किसान समय पर अवार्ड को चुनौती नहीं दे पाए, इसलिए सात साल बाद भी उनके आवेदन को स्वीकार किया जाना चाहिए।
वहीं, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के अधिवक्ताओं ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। NHAI का कहना था कि:
-
मध्यस्थता की कार्रवाई शुरू करने के लिए ‘परिसीमा अधिनियम’ (Limitation Act) का अनुच्छेद 137 लागू होता है।
-
इसके तहत किसी भी चुनौती के लिए केवल 3 वर्ष की समय सीमा निर्धारित है।
-
केरल उच्च न्यायालय के हालिया फैसलों का उदाहरण देते हुए NHAI ने कहा कि कलेक्टर के निर्णय के खिलाफ सीधे रिट याचिका दायर करना कानूनन गलत है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मामला
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि वर्तमान में यह कानूनी प्रश्न कि ‘क्या मध्यस्थता की कार्रवाई पर परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) लागू होगा या नहीं’, अभी भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष विचाराधीन है। हाईकोर्ट ने माना कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस पर अंतिम फैसला नहीं सुना देता, तब तक मौजूदा कानूनी ढांचे और उपलब्ध वैकल्पिक उपायों (जिला न्यायालय) को ही प्राथमिकता दी जाएगी।
याचिकाकर्ताओं को मिली जिला अदालत जाने की छूट
हाईकोर्ट ने उधम सिंह नगर के कलेक्टर के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं को यह राहत दी है कि वे संबंधित जिला न्यायालय में अपनी गुहार लगा सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है और सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना प्रक्रियाओं का उल्लंघन माना जाएगा।

