उत्तराखंड

पौड़ी गढ़वाल में मछली पालन बना ग्रामीणों की नई उम्मीद, 600 से अधिक किसान जुड़े व्यवसाय से

Fish farming has become a new hope for the villagers in Pauri Garhwal, more than 600 farmers are associated with this business

उत्तराखंड का पर्वतीय जिला पौड़ी गढ़वाल अब मछली पालन के क्षेत्र में एक नई पहचान बना रहा है। जहां पहले इसे शौक के रूप में देखा जाता था, वहीं अब यह स्थानीय ग्रामीणों के लिए आजीविका का एक सशक्त माध्यम बन चुका है। पिछले चार वर्षों में इस क्षेत्र में मछली पालन को अपनाने वाले किसानों की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में जिले में 600 से अधिक किसान मत्स्य पालन से जुड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

कृषकों को स्थायी आमदनी का जरिया

गौरीकोट गांव के कृषक अनिल रावत जैसे कई ग्रामीण मछली पालन को सफल व्यवसाय के रूप में चला रहे हैं। अनिल ने खेत के एक हिस्से में तालाब बनाकर मछली पालन की शुरुआत की थी। वर्तमान में उनके पास 1,500 से अधिक मछलियों का स्टॉक है, जिससे उन्हें नियमित आय हो रही है। अनिल का कहना है कि पहाड़ों में जल स्रोतों की भरमार है, बस जरूरत है वैज्ञानिक तरीके और योजनाबद्ध तरीके से संसाधनों के उपयोग की। उनके अनुभव से प्रेरित होकर अब कई युवा भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

विभागीय योजनाओं का मिल रहा लाभ

प्रभारी मत्स्य अधिकारी अभिषेक मिश्रा के अनुसार, राज्य सरकार मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए किसानों को तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और सब्सिडी भी प्रदान कर रही है। तालाब निर्माण से लेकर मछली की अच्छी नस्लों की उपलब्धता तक, विभाग हर स्तर पर सहयोग कर रहा है। तिलापिया और पंगास जैसी व्यावसायिक प्रजातियों के पालन से किसानों की आमदनी में भी इजाफा हुआ है।

पलायन रोकने की दिशा में अहम पहल

ग्रामीणों का मानना है कि खेती के साथ मछली पालन जोड़कर पलायन की समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। स्थानीय बाजारों में मछलियों की अच्छी मांग है, जिससे उत्पादकों को उचित मूल्य भी मिल रहा है। इससे न केवल रोजगार के अवसर बढ़े हैं, बल्कि युवाओं को पहाड़ में ही स्थायी रूप से बसने की राह भी मिली है।

प्राकृतिक संसाधनों से उभरी नई राह

उत्तराखंड की 2,600 किलोमीटर से अधिक लंबी नदियां महाशीर और ट्राउट जैसी मछलियों के पालन की असीम संभावना प्रदान करती हैं। मत्स्य विभाग ने इन नदियों को बीटों में बांटकर स्थानीय समूहों को इसका अधिकार सौंपा है। साथ ही, तालाब आधारित मछली पालन को भी बढ़ावा मिल रहा है, जिससे साल भर उत्पादन संभव है।

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