उत्तराखंड

उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक दीवान कनवाल का निधन, लोक संगीत जगत में शोक की लहर

Famous Uttarakhand folk singer Diwan Kanwal passes away, wave of mourning in the folk music world

देहरादून: उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और कुमाऊंनी संगीत को नई पहचान दिलाने वाले प्रसिद्ध लोकगायक Diwan Kanwal का बुधवार सुबह निधन हो गया। उन्होंने अल्मोड़ा के खत्याड़ी स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे प्रदेश में लोक कलाकारों और संगीत प्रेमियों के बीच शोक की लहर दौड़ गई।

परिवार और करीबी सूत्रों के अनुसार, दीवान कनवाल पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनका इलाज Haldwani के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। इलाज के बाद वे स्वास्थ्य लाभ के लिए अपने घर लौट आए थे, लेकिन बुधवार सुबह करीब चार बजे उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार Betaleshwar Ghat पर किया जाएगा।

मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने जताया शोक

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने प्रसिद्ध लोक कलाकार के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि दीवान कनवाल ने उत्तराखंड की लोक परंपराओं, गीत-संगीत और सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनका निधन राज्य की लोक कला और सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।

मुख्यमंत्री धामी ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हुए शोक संतप्त परिवार और उनके प्रशंसकों को इस दुःख को सहने की शक्ति देने की कामना की।

वहीं, उत्तराखंड के राज्यपाल Gurmit Singh ने भी दीवान कनवाल के निधन पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि उनके गीतों ने कुमाऊंनी लोक संस्कृति को नई पहचान दिलाई और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम किया।

लोकगीतों से बनाई अलग पहचान

अल्मोड़ा जिले के निवासी दीवान कनवाल ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा लोकगीतों के सृजन और प्रस्तुति को समर्पित किया। उनका लोकप्रिय गीत ‘द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनी में’ आज भी उत्तराखंड के लोगों के दिलों में बसा हुआ है। उनके गीतों में जीवन की क्षणभंगुरता, पहाड़ की संवेदनाएं और लोकजीवन की सादगी झलकती थी।

बीते वर्ष उन्होंने प्रसिद्ध लोक कलाकार ‘शेर दा अनपढ़’ की स्मृति को ताजा करते हुए एक नया गीत भी रचा था, जिसे श्रोताओं ने काफी पसंद किया।

परिवार और व्यक्तिगत जीवन

करीब 65 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले दीवान कनवाल के परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं। उनका बड़ा बेटा अल्मोड़ा में निजी क्षेत्र में कार्यरत है, जबकि छोटा बेटा मुंबई में नौकरी करता है। उनकी पत्नी का निधन कई वर्ष पहले हो चुका था। वर्तमान में उनके घर में उनकी वृद्ध मां और बड़ा बेटा साथ रहते हैं।

बताया जाता है कि जिला सहकारी बैंक से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने पूरी तरह से लोकसंगीत और रचनात्मक कार्यों को अपना जीवन समर्पित कर दिया था।

कुमाऊंनी संस्कृति की अमूल्य धरोहर

स्थानीय लोक कलाकारों और सांस्कृतिक संगठनों ने कहा कि दीवान कनवाल की रचनाएं कुमाऊंनी संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। उनके गीतों ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि समाज को जीवन के गहरे संदेश भी दिए।

उनके निधन से उत्तराखंड के लोकसंगीत जगत में जो खालीपन आया है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा। उनके गीत और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनकर हमेशा जीवित रहेंगे।

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