सीएम धामी ने किया ऐतिहासिक गौचर मेले का शुभारंभ, सांस्कृतिक और व्यापारिक धरोहर का हुआ आगाज़
CM Dhami inaugurated the historic Gauchar Fair, marking the beginning of cultural and commercial heritage.
देहरादून/चमोली: उत्तराखंड की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत गौचर मेला आज औपचारिक रूप से शुरू हो गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चमोली जिले के गौचर मैदान में आयोजित इस बहुप्रतीक्षित मेले का उद्घाटन किया। सात दिनों तक चलने वाले इस मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं और पारंपरिक व्यापारिक गतिविधियां आयोजित की जाएंगी।
मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि गौचर मेला न केवल चमोली जिले की पहचान है, बल्कि यह देवभूमि की सांस्कृतिक समृद्धि और जनजीवन की अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पारंपरिक मेलों और हाट बाजारों को संरक्षण और पहचान देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेल प्रतियोगिताओं से सजेगा मेला
गौचर मैदान और आसपास के क्षेत्र को विशेष रूप से सजाया और व्यवस्थित किया गया है। प्रशासन ने मेले के दौरान सुरक्षा, पार्किंग, परिवहन, साफ-सफाई और यातायात नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम किए हैं। मेले में प्रतिदिन रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी, जिनमें उत्तराखंड की लोककलाओं के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों के कलाकार भी भाग लेंगे।
खेलकूद प्रतियोगिताओं में स्थानीय युवाओं के साथ बाहरी राज्यों के खिलाड़ी भी सहभागिता करेंगे।
उत्तराखंड के सबसे बड़े मेलों में शामिल रहा है गौचर मेला
गौचर मेला लंबे समय से उत्तराखंड की सांस्कृतिक और व्यापारिक पहचान रहा है। कभी यह प्रदेश का सबसे बड़ा मेला माना जाता था। यहां आयोजित कृषि मेले में देशभर के किसान असाधारण सब्जियों की प्रजातियां लेकर आते थे।
मेला देखने पहुंचने वाले लोग विशाल लौकी, मूली और अन्य कृषि उत्पादों को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे। इसके अलावा मेले की खेल प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए देश भर से कलाकार और खिलाड़ी आते थे, जिससे यह मेला राष्ट्रीय पहचान हासिल कर सका।
भोटिया जनजाति की पहल से शुरू हुई ऐतिहासिक परंपरा
गौचर मेले की शुरुआत भोटिया जनजाति के लोगों की पहल पर हुई थी, जो पिथौरागढ़ और चमोली के जनजातीय क्षेत्रों में तिब्बत सीमा से सटे गांवों में रहते थे। इन क्षेत्रों के व्यापारी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए स्थानीय हाट बाजार लगाते थे, जो धीरे-धीरे मेले का स्वरूप लेने लगा।
1943 में हुई मेले की औपचारिक शुरुआत
नीती-माणा घाटी के प्रमुख व्यापारी और जनप्रतिनिधि—स्व. बाल सिंह पाल, पान सिंह बमपाल और गोविंद सिंह राणा—ने इस तरह के बड़े व्यापारिक आयोजन की परिकल्पना रखी। प्रतिष्ठित पत्रकार स्वर्गीय गोविंद सिंह नोटियाल और तत्कालीन गढ़वाल डिप्टी कमिश्नर के सुझाव पर वर्ष 1943 में गौचर में व्यापारिक मेले की औपचारिक शुरुआत की गई।
शुरुआत में यह एक वाणिज्यिक केंद्र के रूप में स्थापित हुआ, लेकिन समय के साथ यह मेला औद्योगिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयामों से समृद्ध होता गया।
आज भी जीवंत है परंपरा
गौचर मेला आज भी स्थानीय लोगों, व्यापारियों, किसानों और कलाकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। यह मेला न केवल व्यापार का माध्यम है, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा और जनजीवन के उत्सव का प्रतीक भी है।
सात दिनों तक चलने वाला यह मेला इस बार भी बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करने की उम्मीद रखता है।

