उत्तराखंड

Himalayan Carbon Dioxide Emission: उत्तराखंड के गर्म जलस्रोतों से हर साल 224 टन CO2 का उत्सर्जन

Himalayan Carbon Dioxide Emission: Uttarakhand's hot springs emit 224 tonnes of CO2 every year.

हिमालयी क्षेत्रों को हमेशा से carbon sink यानी कार्बन को सोखने वाले क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती दी है। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल से सामने आई जानकारी के अनुसार Himalayan carbon dioxide emission का एक नया स्रोत सामने आया है। यहां के गर्म जलस्रोत हर साल बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर रहे हैं, जिससे पर्यावरण को लेकर नई चिंता पैदा हो गई है।

224 टन CO2 का सालाना उत्सर्जन

वैज्ञानिकों के अनुसार कुमाऊं क्षेत्र के गर्म जलस्रोतों से हर साल करीब 224 टन कार्बन डाइऑक्साइड निकल रही है। मानसून के बाद यह मात्रा थोड़ी कम होकर लगभग 206 टन रह जाती है। यह आंकड़ा बताता है कि Himalayan carbon dioxide emission केवल औद्योगिक या मानव गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक प्रक्रियाएं भी इसमें अहम भूमिका निभा रही हैं।

वाडिया संस्थान के शोध में खुलासा

यह चौंकाने वाला खुलासा Wadia Institute of Himalayan Geology के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में सामने आया है। इस अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय जर्नल Geothermics (2026) में प्रकाशित किया गया है। शोध के अनुसार हिमालय के अंदर होने वाली भूगर्भीय प्रक्रियाएं Himalayan carbon dioxide emission का कारण बन रही हैं।

कैसे बनती है कार्बन डाइऑक्साइड

संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक Sameer Tiwari के अनुसार हिमालय के भीतर चट्टानों पर लाखों वर्षों तक अत्यधिक दबाव और तापमान पड़ता है। इस दौरान चूना पत्थर और डोलोमाइट जैसी चट्टानों में रासायनिक परिवर्तन होते हैं। इसी प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड बनती है, जो दरारों और फाल्ट लाइनों के जरिए सतह तक पहुंचती है। यही प्रक्रिया Himalayan carbon dioxide emission को जन्म देती है।

छह स्थानों पर किया गया परीक्षण

इस अध्ययन के तहत कुमाऊं के छह स्थानों किमिलखेत, बधेली, देवीबागर, सेराघाट, देवकुना और तेजम में गर्म जलस्रोतों की जांच की गई। वैज्ञानिकों ने इन स्थानों पर तापमान, गैस फ्लक्स और रासायनिक संरचना की जांच की। इन सभी परीक्षणों से यह स्पष्ट हुआ कि Himalayan carbon dioxide emission एक लगातार चलने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है।

मानसून का असर भी आया सामने

अध्ययन में यह भी पाया गया कि मानसून का इस प्रक्रिया पर असर पड़ता है। मानसून से पहले CO2 उत्सर्जन ज्यादा होता है, जबकि बारिश के बाद इसकी मात्रा कम हो जाती है। इसका कारण यह है कि बारिश का पानी गर्म जलस्रोतों में मिलकर गैस को पतला कर देता है। इससे Himalayan carbon dioxide emission की तीव्रता कुछ हद तक कम हो जाती है।

10 हजार पेड़ों के बराबर उत्सर्जन

वैज्ञानिकों के अनुसार जितनी कार्बन डाइऑक्साइड ये जलस्रोत उत्सर्जित कर रहे हैं, उसे सोखने के लिए करीब 10 हजार पेड़ों की जरूरत होती है। यह आंकड़ा इस बात को और गंभीर बनाता है कि Himalayan carbon dioxide emission का प्रभाव पर्यावरण पर कितना बड़ा हो सकता है। अगर ऐसे जलस्रोतों की संख्या पूरे हिमालय में हजारों में है, तो कुल उत्सर्जन का स्तर काफी अधिक हो सकता है।

जमीन के अंदर छिपा है बड़ा स्रोत

अध्ययन के दौरान तापमान मापने से यह भी पता चला कि ये जलस्रोत धरती के काफी नीचे मौजूद हैं। सतह पर पानी का तापमान 27 से 41 डिग्री सेल्सियस के बीच पाया गया, जबकि भूगर्भ में यह तापमान 130 डिग्री तक पहुंचता है। इससे अंदाजा लगाया गया कि ये जलस्रोत लगभग 1.1 किलोमीटर की गहराई में स्थित हैं। यह जानकारी Himalayan carbon dioxide emission के स्रोत को समझने में मदद करती है।

पर्यावरण के लिए क्यों है चिंता

अब तक हिमालय को कार्बन को सोखने वाला क्षेत्र माना जाता था, लेकिन इस नई जानकारी ने यह दिखाया है कि यह क्षेत्र कार्बन का उत्सर्जन भी कर सकता है। Himalayan carbon dioxide emission का यह पहलू जलवायु परिवर्तन की समझ को और जटिल बनाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस दिशा में और रिसर्च की जरूरत है ताकि पूरे हिमालय क्षेत्र का सही आकलन किया जा सके।

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