Firewood Prices Spike: वैश्विक युद्ध की तपिश से दहका उत्तराखंड का बाजार, गैस किल्लत ने बढ़ाई लकड़ी-कोयले की मांग, दाम हुए दोगुने
Firewood Prices Spike: The heat of the global war has scorched Uttarakhand's market, fueled by gas shortages, increasing demand for wood and coal, and prices have doubled.
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के तनाव ने सात समंदर पार उत्तराखंड के रसोई घरों का बजट बिगाड़ दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा संकट और एलपीजी गैस सिलेंडरों की अनिश्चित आपूर्ति के कारण राज्य में जलाऊ लकड़ी और कोयले की मांग में अप्रत्याशित उछाल आया है। आलम यह है कि जो लकड़ी कल तक आसानी से उपलब्ध थी, आज उसके दाम आसमान छू रहे हैं। Uttarakhand Firewood Prices Spike LPG Crisis 2026 की इस स्थिति ने मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों को पारंपरिक चूल्हों की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय तनाव का स्थानीय असर
ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य तनातनी का सीधा असर वैश्विक पेट्रोलियम और गैस आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ा है। एलपीजी की उपलब्धता को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण लोगों में डर (Panic Buying) का माहौल है। इसी डर ने उत्तराखंड के शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जलाऊ लकड़ी की मांग को बढ़ा दिया है। व्यापारियों का कहना है कि लोग अब गैस के भरोसे रहने के बजाय पारंपरिक ईंधन का स्टॉक जमा कर रहे हैं।
कीमतों में भारी उछाल
बाजार के आंकड़ों पर नजर डालें तो जलाऊ लकड़ी की कीमतों ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
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पहले के दाम: सामान्य दिनों में जलाऊ लकड़ी 600 से 700 रुपये प्रति क्विंटल बिकती थी।
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वर्तमान स्थिति: मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने के कारण अब यही लकड़ी 1500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है।
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खुदरा भाव: फुटकर बाजारों में जो लकड़ी 12 रुपये प्रति किलो मिलती थी, वह अब 15 से 18 रुपये प्रति किलो बिक रही है। वहीं, कोयले के दामों में भी प्रति किलो 5 रुपये तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
व्यापारियों की जुबानी
कड़ मंडी के लॉट स्वामी हरबंस सिंह बताते हैं कि युद्ध की आहट के बाद से ही खरीदारी का पैटर्न बदल गया है। पहले केवल ढाबा संचालक या हलवाई ही भारी मात्रा में लकड़ी खरीदते थे, लेकिन अब घरेलू उपभोक्ता भी क्विंटल के हिसाब से ऑर्डर दे रहे हैं। वहीं, होलसेल व्यापारी अभिषेक सिंघल का कहना है कि लकड़ी के साथ-साथ लोहे और मिट्टी के पारंपरिक चूल्हों की बिक्री में भी अचानक तेजी आई है। लोग इंडक्शन और डीजल भट्ठियों के बजाय अब लकड़ी को एक सुरक्षित और तुरंत उपलब्ध विकल्प मान रहे हैं।
वन विकास निगम की नीतियां और आपूर्ति का संकट
राज्य में लकड़ी की आपूर्ति मुख्य रूप से वन विकास निगम के माध्यम से होती है। व्यापारियों का दावा है कि निगम वर्तमान में इमारती लकड़ी (Timber) की नीलामी को प्राथमिकता दे रहा है, जिससे जलाऊ लकड़ी की आवक कम हो गई है। आपूर्ति और मांग के बीच बढ़ते इस अंतर का फायदा उठाकर कई बिचौलिए मनमाने दाम वसूल रहे हैं। वन निगम ने बढ़ती मांग को देखते हुए बिक्री पर कुछ सीमाएं भी तय की हैं, जिससे बाजार में किल्लत और बढ़ गई है।
पर्यावरण पर मंडराता खतरा
जलाऊ लकड़ी और कोयले के बढ़ते उपयोग ने पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में देहरादून का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 के पार चला गया था, जिसे ‘बेहद खराब’ श्रेणी में रखा जाता है। अगर इसी तरह बड़ी संख्या में लोग दोबारा लकड़ी के चूल्हों और भट्ठियों की तरफ लौटे, तो शहर का प्रदूषण स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। धुएं के कारण सांस संबंधी बीमारियां बढ़ने का भी खतरा है। – पर्यावरण विशेषज्ञ

