उत्तराखंड

1200 ग्लेशियर झीलों का बढ़ता खतरा, उत्तराखंड ने वाडिया इंस्टीट्यूट को सौंपी निगरानी की अहम जिम्मेदारी

The growing threat from 1200 glacial lakes, Uttarakhand entrusts the Wadia Institute with the crucial responsibility of monitoring them.

देहरादून: जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बदलते हालात के बीच उत्तराखंड सरकार ने ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न संभावित आपदाओं को लेकर बड़ा कदम उठाया है। राज्य में मौजूद संवेदनशील और अतिसंवेदनशील ग्लेशियर झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और जोखिम आकलन के लिए वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी को नोडल एजेंसी घोषित किया गया है। इसके साथ ही संस्थान ने इस जिम्मेदारी को संभालने पर सहमति जता दी है, जिससे राज्य की आपदा प्रबंधन तैयारियों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

हिमालयी क्षेत्र में फैली झीलें, बढ़ती चिंता

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में 968 से अधिक ग्लेशियर और उनसे जुड़ी लगभग 1200 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। इनमें से कई झीलें ऐसी हैं, जिनमें भविष्य में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी गंभीर आपदाओं का खतरा बना हुआ है। वर्ष 2024 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील और अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया था और इनके नियमित अध्ययन की सिफारिश की गई थी।

पहले चरण में सीमित निगरानी

एनडीएमए की रिपोर्ट के आधार पर राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने पहले चरण में पांच अत्यधिक संवेदनशील झीलों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया था। चमोली जिले की वसुधारा ग्लेशियर झील का विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन भी किया गया। वहीं, पिथौरागढ़ जिले की कुछ झीलों पर अध्ययन की योजना बनी, लेकिन 2025 के मॉनसून के दौरान प्राकृतिक आपदाओं के कारण यह कार्य अधूरा रह गया।

नोडल एजेंसी के रूप में वाडिया इंस्टीट्यूट

इन चुनौतियों को देखते हुए राज्य सरकार ने निगरानी व्यवस्था को अधिक संगठित और प्रभावी बनाने का निर्णय लिया है। अब वाडिया इंस्टीट्यूट नोडल एजेंसी के रूप में सभी संवेदनशील झीलों के अध्ययन, डाटा संकलन और तकनीकी समन्वय का नेतृत्व करेगा। आपदा प्रबंधन विभाग की भूमिका सहयोग और समन्वय तक सीमित रहेगी, जबकि वाडिया इंस्टीट्यूट अन्य केंद्रीय संस्थानों के साथ मिलकर कार्य करेगा।

सेंसर और सायरन से मिलेगी समय रहते चेतावनी

सरकार की योजना चयनित ग्लेशियर झीलों पर आधुनिक सेंसर और चेतावनी सायरन लगाने की है। इससे जलस्तर में अचानक बदलाव या किसी संभावित खतरे की जानकारी समय रहते मिल सकेगी। इन उपकरणों के तकनीकी मानकों और स्थापना की प्रक्रिया पर वाडिया इंस्टीट्यूट काम कर रहा है।

डेटा एकीकरण और तेज कार्रवाई पर जोर

केंद्रीय जल आयोग, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और मौसम विभाग जैसी एजेंसियों की रिपोर्टों को एकीकृत कर समग्र आकलन तैयार किया जाएगा। वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत के अनुसार, फिलहाल शोध से ज्यादा जोर ऑपरेशनल तैयारियों पर है, ताकि आने वाले मॉनसून से पहले निगरानी व्यवस्था पूरी तरह लागू हो सके।

सरकार का मानना है कि बेहतर समन्वय और समय पर चेतावनी प्रणाली से ग्लेशियर झीलों से होने वाली आपदाओं के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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