उत्तराखंड

देवलांग मेले में उमड़ा जनसैलाब, ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूमे ग्रामीण

Crowds gathered at the Devlang fair, villagers danced to the beats of drums.

उत्तरकाशी: सीमांत उत्तरकाशी जिले में पारंपरिक देवलांग मेला इस वर्ष भी पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। बड़कोट, ठकराल और जबरी पट्टी के विभिन्न गांवों में आयोजित इस मेले में भारी संख्या में ग्रामीण और मेलार्थी पहुंचे। देवलांग पर्व की शुरुआत होते ही पूरे क्षेत्र में ढोल-दमाऊं की थाप गूंज उठी और ग्रामीणों ने स्थानीय नृत्यों के साथ संस्कृति का शानदार प्रदर्शन किया। अलग-अलग गांवों से आए लोग पारंपरिक वेशभूषा में नजर आए, जिसने मेले की रौनक बढ़ा दी।


देवदार का वृक्ष काटकर लगाया, आग प्रज्वलित कर निभाई परंपरा

ठकराल पट्टी के देवलांग जंगल से देवदार के विशाल वृक्ष को काटकर क्षेत्रीय आराध्य रघुनाथ देवता के प्रांगण में परंपरा अनुसार लाया गया। इसके बाद ग्रामीणों ने लकड़ी के लंबे डंडों की सहायता से इसे सावधानीपूर्वक खड़ा किया और फिर उसके नीचे अग्नि प्रज्वलित की गई। यह अनुष्ठान सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है, जिसे देखने के लिए ग्रामीणों के साथ-साथ दूर-दूर से आए लोग भी उत्साहित दिखाई दिए। देवलांग के खड़े होने के बाद गांव में रातभर जागरण, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दौर चलता रहा। लोक कलाकारों के प्रस्तुतिकरण से पूरा वातावरण उत्सवमय बना रहा।


आग से घिरे पेड़ पर चढ़कर युवाओं ने निभाई परंपरा, नहीं होता कोई घायल

देवलांग मेले का सबसे रोमांचक दृश्य वह होता है, जब जलती आग के बीच पेड़ के शीर्ष तक पहुंचने के लिए युवा अपनी जान की बाजी लगाते हैं। पेड़ को आग से घिरा होने के बावजूद युवक तेजी से ऊपर चढ़ते हैं और परंपरा अनुसार जलते हुए बिंदुओं के बीच से रस्सी बाधित कर नीचे लाते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि भगवान सिद्धेश्वर की कृपा से इस साहसिक परंपरा के दौरान कभी कोई युवक घायल नहीं होता। यही कारण है कि इस मेले में आस्था, रोमांच और विश्वास का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।


पुजारगांव धनारी में रस्साकशी का आयोजन, बराबरी पर छूटा मुकाबला

पुजारगांव धनारी में आयोजित ऐतिहासिक सिद्धेश्वर देवलांग मेले में तीन गांव—पुजारगांव, दड़माली और गवाणा—की टीमों के बीच रस्साकशी प्रतियोगिता हुई। ग्रामीणों ने जंगल से लाए चीड़ के विशाल वृक्ष को रस्सियों के सहारे खड़ा किया और इसके बाद तीन दिशाओं से बांधकर अनूठी रस्साकशी का आयोजन किया गया। मुकाबला काफी रोमांचक रहा, लेकिन रस्सी टूटने के कारण यह प्रतियोगिता बराबरी पर समाप्त हुई। पेड़ को खड़ा करने और उसके शीर्ष पर घास लगाकर उसे जलाने के बाद ग्रामीणों ने मंदिर प्रांगण में जमकर नृत्य किया और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।


सिद्धेश्वर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना, ग्रामीणों ने की खरीदारी

मेले में लगे व्यापारिक स्टॉलों पर ग्रामीणों ने खूब खरीदारी की, जिससे पूरे बाजार क्षेत्र में रौनक बनी रही। सिद्धेश्वर देवता मंदिर में पुजारी द्वारा विशेष पूजा-अर्चना की गई और भक्तों को आशीर्वाद दिया गया। इस वर्ष नवनिर्मित सिद्धेश्वर मंदिर अपनी भव्यता के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। देवलांग या दिलंक मेला स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है, जहां चीड़ के पेड़ को मंदिर प्रांगण में खड़ा करके उसे अग्नि से प्रज्ज्वलित करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। अंत में रस्साकशी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद ग्रामीण खुशी-खुशी अपने घरों को लौटे।

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