हिमालयी जड़ी-बूटियों के संरक्षण के लिए बनेगा रोडमैप, 47 हजार किसानों को मिलेगा फायदा
Roadmap to be created for the conservation of Himalayan herbs, 47,000 farmers to benefit
Himalayan Herbs: उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों के संरक्षण और बेहतर इस्तेमाल को लेकर सरकार ने तैयारी शुरू कर दी है। आयुष विभाग इस दिशा में जल्द ही संबंधित विभागों के साथ बैठक करेगा। इसमें जड़ी-बूटियों के संरक्षण, खेती को बढ़ावा देने और किसानों को बेहतर अवसर देने के लिए विस्तृत रोडमैप तैयार किया जाएगा।
उत्तराखंड में प्राकृतिक रूप से कई तरह की वनस्पतियां पाई जाती हैं। इनमें करीब 2,300 ऐसी वनस्पतियां बताई गई हैं, जिनका इस्तेमाल लंबे समय से औषधीय उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है। हिमालयी क्षेत्र में मौजूद इन वनस्पतियों की उपयोगिता को देखते हुए इनके संरक्षण पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
आयुष विभाग तैयार कर रहा खाका
हिमालयी जड़ी-बूटियों के बेहतर उपयोग को लेकर आयुष विभाग ने प्रारंभिक खाका तैयार किया है। अब इस पर उद्यान विभाग, जड़ी-बूटी केंद्र और दूसरे संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ चर्चा की जाएगी। बैठक के बाद जड़ी-बूटियों के संरक्षण और किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए विस्तृत योजना तैयार होगी।
आयुष विभाग की सचिव रंजना राजगुरु के मुताबिक, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद जड़ी-बूटियों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में विभाग काम कर रहा है। उन्होंने अधिकारियों को उद्यान विभाग के साथ बैठक करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि अगले कुछ दिनों में आयुष, उद्यान और जड़ी-बूटी केंद्र के अधिकारियों के साथ बैठक की जाएगी।
जड़ी-बूटी और सगंध खेती से जुड़े 47 हजार किसान
उत्तराखंड में जड़ी-बूटी और सगंध खेती से करीब 47 हजार किसान जुड़े हुए हैं। ऐसे में प्रस्तावित रोडमैप में किसानों की भूमिका अहम होगी। विभाग यह तय करने की कोशिश करेगा कि किसानों को किस तरह और अधिक प्रोत्साहित किया जा सकता है।
सरकार की ओर से पहले ही जड़ी-बूटी और सगंध प्रजातियों की खेती को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी बढ़ाई जा चुकी है। कुछ प्रजातियों के लिए अनुदान में ढाई से तीन गुना तक वृद्धि की गई है। अधिकतम अनुदान की सीमा एक लाख रुपये या दो हेक्टेयर क्षेत्रफल तक निर्धारित की गई है।
186 गांव जड़ी-बूटी ग्राम के रूप में चिन्हित
उत्तराखंड को आयुष प्रदेश बनाने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। इसके तहत प्रदेश के 186 गांवों को जड़ी-बूटी ग्राम के रूप में चिन्हित किया गया है। इनमें से 13 गांवों को आयुष ग्राम के रूप में विकसित करने के लिए तैयार बताया गया है।
इस पहल का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर औषधीय पौधों की खेती और इनके संरक्षण को बढ़ावा देना है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और किसानों की आय के नए अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
तेजपत्ता, तिमूर और चंदन भी सब्सिडी के दायरे में
नई प्रजातियों को बढ़ावा देने के लिए तेजपत्ता, तिमूर और चंदन जैसे पौधों को भी सब्सिडी के दायरे में शामिल किया गया है। इससे किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ औषधीय और सगंध पौधों की खेती के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
अब आयुष विभाग यह तय करेगा कि जड़ी-बूटी उत्पादन से लेकर उसके बेहतर उपयोग तक विभाग की क्या भूमिका हो सकती है। इसके लिए संबंधित विभागों के साथ समन्वय बढ़ाने पर जोर रहेगा।
संरक्षण के साथ बाजार पर भी रहेगा फोकस
हिमालयी जड़ी-बूटियों के संरक्षण के साथ उनके व्यवस्थित इस्तेमाल की रणनीति बनाना भी जरूरी है। प्रस्तावित रोडमैप में किसानों को उत्पादन, प्रोत्साहन और बेहतर उपयोग से जोड़ने के पहलुओं पर चर्चा होगी।
आयुष विभाग, उद्यान विभाग और जड़ी-बूटी केंद्र के बीच होने वाली बैठक के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी। सरकार की कोशिश है कि हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का संरक्षण भी हो और इससे जुड़े किसानों को भी इसका लाभ मिल सके।



