नंदा देवी मेले का भव्य समापन, मां नंदा-सुनंदा की शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब, नम आंखों से दी विदाई
Grand conclusion of the Nanda Devi Fair, a massive crowd turned out for the procession of Goddesses Nanda and Sunanda, bidding them farewell with teary eyes.
अल्मोड़ा: उत्तराखंड के अल्मोड़ा में चल रहा ऐतिहासिक नंदा देवी मेला बुधवार को मां नंदा-सुनंदा की भव्य शोभायात्रा के साथ संपन्न हो गया। मां की विदाई के लिए शहर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। पूरे यात्रा मार्ग पर मां नंदा और सुनंदा के जयकारे गूंजते रहे। माहौल भक्तिमय रहा और कई श्रद्धालुओं ने नम आंखों से मां को विदाई दी।
चंद वंशजों ने की पूजा, मंदिर से निकला डोला
शोभायात्रा से पहले चंद वंशज नरेंद्र चंद राज सिंह ने नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके बाद प्रतिमाओं को डोले में विराजमान कर मंदिर की परिक्रमा कराई गई। शाम के समय डोला नंदा देवी मंदिर परिसर से रवाना हुआ।
शोभायात्रा लाला बाजार, बंसल गली और माल रोड से होते हुए ड्यूयोलीपोखर पहुंची। यहां मां की आरती की गई। इसके बाद यात्रा सीढ़ी बाजार और चौक बाजार होते हुए आगे बढ़ी। कचहरी बाजार और जौहरी बाजार से गुजरते हुए डोला कैंट क्षेत्र स्थित डोबानौला पहुंचा।
डोबानौला में हुआ प्रतिमाओं का विसर्जन
डोबानौला में धार्मिक परंपराओं के अनुसार मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। विसर्जन के बाद चंद वंशज वापस नंदा देवी मंदिर पहुंचे। यहां दोबारा पूजा-अर्चना की गई। इसके साथ ही इस साल के मेले से जुड़े प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए।
मां की शोभायात्रा के दौरान शहर के विभिन्न बाजारों में श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई दी। स्थानीय लोगों के साथ आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग मां के दर्शन और विदाई में शामिल होने पहुंचे।
15 सितंबर से शुरू हुआ था नंदा देवी मेला
अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला 15 सितंबर से शुरू हुआ था। कई दिनों तक चले इस आयोजन में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियों और लोक संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों ने मेले को खास बनाया।
नंदा देवी मेला अल्मोड़ा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा प्रमुख आयोजन माना जाता है। इसे श्रद्धा के साथ-साथ कुमाऊं की लोक परंपराओं को करीब से देखने का अवसर भी माना जाता है।
करीब 400 साल पुरानी है मेले की परंपरा
साहित्यकारों और इतिहास से जुड़े लोगों के अनुसार नंदा देवी मेले का इतिहास करीब चार शताब्दियों पुराना है। माना जाता है कि चंद वंश के शासनकाल में 17वीं शताब्दी के दौरान मल्ला महल से इस मेले की शुरुआत हुई थी। समय के साथ यह आयोजन अल्मोड़ा की प्रमुख सांस्कृतिक परंपरा बन गया।
मेले की सबसे खास परंपराओं में नंदा जागर गायन शामिल है। अल्मोड़ा के छानी-लवेशाल गांव के जागरिए परिवार पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे हैं।
जागर में सुनाई जाती हैं देवी की गाथाएं
नंदा जागर में देवी-देवताओं की स्तुति के साथ पौराणिक प्रसंगों और लोक मान्यताओं से जुड़ी गाथाओं का गायन किया जाता है। साहित्यकार एवं प्रोफेसर देव सिंह पोखरिया के अनुसार, नंदा जागर में सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े प्रसंगों का भी वर्णन मिलता है। शाम के समय होने वाली जागर में आदिदेवी नंदा के साथ अन्य देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है।
चार सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी अल्मोड़ा के नंदा देवी मेले की पहचान बनी हुई है। यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ उत्तराखंड की मौखिक लोक-संस्कृति, इतिहास और सामूहिक स्मृति को भी अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का माध्यम है।



