उत्तराखंड

मोहन भागवत का तीन दिवसीय उत्तराखंड दौरा संपन्न, राष्ट्रीय सुरक्षा से सामाजिक समरसता तक रखे विचार

Mohan Bhagwat concludes his three-day visit to Uttarakhand; shares views on issues ranging from national security to social harmony

देहरादून: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक Mohan Bhagwat ने तीन दिवसीय उत्तराखंड प्रवास के बाद देहरादून से प्रस्थान किया। इस दौरान उन्होंने पूर्व सैनिकों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से संवाद किया। उनके संबोधनों में राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता, समान नागरिक संहिता (UCC), अग्निवीर योजना और पहाड़ों से पलायन जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

पूर्व सैनिकों के साथ संवाद

दौरे के अंतिम दिन गढ़ी कैंट स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में एक विशेष गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें सेना के कई सेवानिवृत्त अधिकारी शामिल हुए। मेजर जनरल से लेकर अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था और सैन्य ढांचे से जुड़े अपने अनुभव साझा किए।

भागवत ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों से नहीं, बल्कि समाज की एकजुटता और जागरूकता से भी सुनिश्चित होती है। उनके अनुसार अनुशासन, चरित्र निर्माण और नेतृत्व क्षमता राष्ट्र को सुदृढ़ बनाते हैं।

संगठन का उद्देश्य और समाज निर्माण

अपने वक्तव्य में उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक भागीदारी नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि जब समाज में आपसी विश्वास और सहयोग बढ़ता है, तब राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना करना आसान हो जाता है।

उन्होंने सामाजिक संवाद की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन समाधान संवाद और समझदारी से ही निकलता है।

अग्निवीर योजना और सुरक्षा मुद्दे

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों पर उन्होंने अग्निवीर योजना को एक नई पहल बताया, जिसे समय के साथ परखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी नई व्यवस्था में अनुभव के आधार पर सुधार संभव है, लेकिन सेना की पेशेवर क्षमता से समझौता नहीं होना चाहिए।

पड़ोसी देशों और कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने भारत की एकता और संप्रभुता पर दृढ़ रुख अपनाने की बात कही। उनके अनुसार राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होना चाहिए और स्थिरता बनाए रखने के लिए स्पष्ट नीति जरूरी है।

सामाजिक समरसता पर जोर

भागवत ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा को भारतीय परंपरा का मूल बताया। उन्होंने कहा कि समाज में विभाजन की बजाय सह-अस्तित्व और समानता की भावना को बढ़ावा देना आवश्यक है। सार्वजनिक स्थानों और संसाधनों तक सभी वर्गों की समान पहुंच सुनिश्चित करने की बात भी उन्होंने दोहराई।

सोशल मीडिया पर बढ़ती वैचारिक कटुता को लेकर उन्होंने संयम और संतुलित संवाद की अपील की। उनके अनुसार स्वस्थ बहस और तर्कपूर्ण चर्चा लोकतंत्र को मजबूत करती है।

UCC और पलायन पर चिंता

समान नागरिक संहिता (UCC) के विषय में उन्होंने व्यापक सहमति की आवश्यकता बताई। आरक्षण और जनसंख्या संतुलन जैसे मुद्दों पर भी संवाद आधारित समाधान पर जोर दिया।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को उन्होंने गंभीर चिंता का विषय बताया। उनका मानना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय रोजगार के अवसरों को मजबूत किए बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

तीन दिवसीय प्रवास के दौरान हुए संवादों ने यह संकेत दिया कि राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों पर व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता समाज में महसूस की जा रही है।

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