भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर सियासी और किसान संगठनों में घमासान
Political and farmer organizations clash over India-US trade deal
मुज़फ्फरनगर, 19 फरवरी 2026: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों के बीच बहस तेज हो गई है। इसी मुद्दे पर पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन Ashok Balyan ने प्रेस बयान जारी कर विरोध करने वाले संगठनों से ठोस तथ्यों के साथ अपनी बात रखने की अपील की है। उनका कहना है कि बिना आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर आशंकाएं फैलाना किसानों को भ्रमित कर सकता है।
“तथ्यों पर हो बहस, अफवाहों पर नहीं”
अशोक बालियान ने कहा कि उन्होंने जो विश्लेषण साझा किया है, वह सरकारी आंकड़ों और आर्थिक रिपोर्टों पर आधारित है। यदि किसी संगठन को इन निष्कर्षों से असहमति है तो वह प्रमाण सहित तर्क प्रस्तुत करे। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में नीति संबंधी चर्चा तथ्यों और पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए, न कि भावनात्मक आरोपों के आधार पर।
संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को बताया सुरक्षित
ट्रेड डील को लेकर उठ रही आशंकाओं के बीच बालियान ने दावा किया कि भारत ने अनाज, डेयरी, दाल और तिलहन जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्रों को समझौते में सुरक्षित रखा है। उनके अनुसार, इन क्षेत्रों में किसी प्रकार की रियायत नहीं दी गई है, जिससे घरेलू किसानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
निर्यात बढ़ाने का अवसर
बालियान का कहना है कि मसाले, फल-सब्जियां, चाय, कॉफी और प्रोसेस्ड फूड जैसे क्षेत्रों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत है। यदि इन उत्पादों को अमेरिकी बाजार में कम या शून्य शुल्क पर प्रवेश मिलता है तो किसानों और निर्यातकों को लाभ हो सकता है। उनका तर्क है कि बड़े बाजार तक आसान पहुंच से कृषि उत्पादों की मांग और मूल्य दोनों में सुधार संभव है।
शुल्क में कमी से प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ क्षेत्रों में टैरिफ में कमी से भारतीय उत्पादों को अन्य देशों की तुलना में बढ़त मिल सकती है। उनका दावा है कि जहां कुछ प्रतिस्पर्धी देश अब भी ऊंचे शुल्क का सामना कर रहे हैं, वहीं भारत को अपेक्षाकृत बेहतर शर्तें मिल सकती हैं। इससे निर्यात में स्थिरता और अनुमान लगाने में आसानी होगी।
विरोध करने वाले संगठनों की आशंकाएं
हालांकि, कुछ किसान संगठनों का मानना है कि दीर्घकाल में आयात बढ़ने से घरेलू बाजार पर दबाव पड़ सकता है। वे आशंका जता रहे हैं कि बड़े पैमाने पर विदेशी उत्पाद आने से छोटे किसानों की आय प्रभावित हो सकती है। इस पर बालियान ने कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले समझौते की अंतिम शर्तों का अध्ययन जरूरी है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रेड डील का वास्तविक प्रभाव तभी स्पष्ट होगा जब सभी प्रावधान सार्वजनिक होंगे। फिलहाल, किसान संगठनों और नीति समर्थकों के बीच जारी यह बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।



