उत्तराखंड

दून बासमती की खुशबू पर संकट, सरकार ने शुरू किया पुनर्जीवन अभियान

The aroma of Doon Basmati rice is under threat; the government has launched a revival campaign.

देहरादून: अपनी अनोखी सुगंध और बेहतरीन स्वाद के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध दून बासमती अब खेतों से लगभग गायब हो रही है। लगातार सिकुड़ती कृषि भूमि, आधुनिक किस्मों का बढ़ता प्रभाव और उत्पादन में गिरावट ने इस पारंपरिक धरोहर को विलुप्ति की कगार पर ला दिया है। इसी संकट को देखते हुए उत्तराखंड सरकार और जिला प्रशासन ने इसे पुनर्जीवित करने का बड़ा अभियान शुरू किया है।


मुख्यमंत्री धामी ने दिया विशेष दायित्व, प्रशासन ने बनाई कार्ययोजना

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दून बासमती के संरक्षण और विस्तार की जिम्मेदारी देहरादून जिला प्रशासन को सौंपी है। इसके बाद प्रशासन ने व्यापक योजना तैयार करते हुए सहसपुर और विकासनगर क्षेत्रों के किसानों को पारंपरिक टाइप-3 दून बासमती की खेती के लिए चुना। बीज चयन से लेकर रोपाई, आधुनिक तकनीक, मौसम आधारित खेती और मार्केट लिंक तक हर स्तर पर किसानों को पूर्ण सहयोग प्रदान किया गया।


सीधी खरीद का मॉडल, किसानों को मिली उचित कीमत

जिला प्रशासन की निगरानी में चल रहे इस अभियान का असर अब दिखने लगा है। ग्राम उत्थान विभाग ने किसानों से 200 क्विंटल से अधिक दून बासमती की सीधी खरीद 65 रुपये प्रति किलो की दर से की है। इससे किसानों के खातों में 13 लाख रुपये से अधिक की सीधी आमदनी पहुंची। यह पहली बार है जब दून बासमती का सरकारी खरीद मॉडल लागू किया गया, जिससे किसानों का विश्वास बढ़ा है।


महिला स्वयं सहायता समूह बने अभियान की ताकत

इस पुनर्जीवन प्रयास में महिला स्वयं सहायता समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। खेती, पैकेजिंग और आपूर्ति तक 200 से अधिक महिलाएं सीधे जुड़ी हुई हैं। स्थानीय महिला सीता ने बताया कि उन्हें उच्च स्तरीय प्रशिक्षण दिया गया, जिसके बाद अब बासमती उत्पादन पहले से अधिक सहज और प्रभावी हो गया है। महिलाओं के समूहों द्वारा किया जा रहा यह सामूहिक प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रहा है।


सर्टिफिकेशन और प्रशिक्षण से बढ़ेगी दून बासमती की पहचान

देहरादून के मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह के अनुसार, पारंपरिक खेती करने वाले किसानों को क्लाइमेट फ्रेंडली कृषि प्रशिक्षण दिया गया है। फसल तैयार होने के बाद कृषि विभाग किसानों को आधिकारिक सर्टिफिकेट भी देगा, जिससे दून बासमती को बाजार में अलग पहचान मिल सकेगी। उन्होंने बताया कि सीमित उत्पादन के कारण दून बासमती बाजार में दुर्लभ होती जा रही है। किसान इसे 200 रुपये किलो बेचते हैं, जबकि रिटेल बाजार में इसकी कीमत 500-600 रुपये तक पहुंच जाती है।


कृषि भूमि सिकुड़ने से बढ़ा खतरा, चार साल में विलुप्ति की आशंका

सीडीओ शाह ने चेताया कि यदि देहरादून की कृषि भूमि निर्माण कार्यों में बदलती रही, तो अगले चार-पांच वर्षों में दून बासमती केवल नामभर रह जाएगी। उत्पादन पहले ही गिरकर सालाना लगभग 10 टन तक सीमित हो चुका है, जो स्थानीय मांग में ही समाप्त हो जाता है।


सरकारी प्रयासों से बढ़ी उम्मीद, बासमती की खुशबू वापस लाने की कोशिश

जिला प्रशासन, किसानों और महिला समूहों के संयुक्त प्रयास से दून बासमती को एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की योजना बनाई गई है। प्रशासन इसकी एसओपी तैयार कर रहा है, ताकि इसे बाजार में मजबूत ब्रांड के रूप में स्थापित किया जा सके। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले वर्षों में दून बासमती की खोई हुई खुशबू और प्रतिष्ठा एक बार फिर लौट आएगी।

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