उत्तराखंड

14 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाकर छोड़ी, अब 52 करोड़ खर्च कर होगी पूरी तरह बंद….उत्तरकाशी में पर्यावरण की बड़ी जीत

A 14-kilometer-long tunnel was left incomplete, and now it will be completely sealed off at a cost of 52 crore rupees... A major environmental victory in Uttarkashi.

उत्तरकाशी:; उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले से सामने आई यह खबर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच चल रही बहस में एक अहम मोड़ मानी जा रही है। लोहारीनाग पाला जल विद्युत परियोजना के तहत बनाई गई करीब 14 किलोमीटर लंबी सुरंगों को अब स्थायी रूप से बंद किया जा रहा है। इसके लिए सरकार को लगभग 52 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। आर्थिक नुकसान के बावजूद लिया गया यह फैसला इस बात का संकेत है कि पर्यावरण और नदियों की सुरक्षा को अब प्राथमिकता दी जा रही है।

600 मेगावाट की परियोजना, जो बीच में ही थम गई

लोहारीनाग पाला जल विद्युत परियोजना 600 मेगावाट क्षमता की एक बड़ी योजना थी, जिसकी शुरुआत वर्ष 2006 में एनटीपीसी द्वारा की गई थी। इस परियोजना की कुल लागत करीब 2000 करोड़ रुपये आंकी गई थी। लेकिन निर्माण कार्य आगे बढ़ने के साथ ही स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों का विरोध भी तेज होता गया। गंगा नदी के प्रवाह को सुरंगों के जरिए मोड़े जाने को लेकर गहरी चिंता जताई गई। लगातार बढ़ते विरोध के चलते वर्ष 2010 में केंद्र सरकार ने इस परियोजना को रद्द करने का फैसला लिया। तब तक करीब 650 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे।

अब सुरंगों को भरने पर करोड़ों का खर्च

परियोजना रद्द होने के बावजूद बनाई गई सुरंगें भविष्य में नदी के प्रवाह के लिए खतरा बनी हुई थीं। इसी वजह से अब इन्हें पूरी तरह पाटने का निर्णय लिया गया है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की निगरानी में यह कार्य किया जा रहा है। पहले सुरंगों के भीतर जमा पानी और गाद को निकाला जा रहा है, फिर मिट्टी और मलबे से इन्हें पूरी तरह भर दिया जाएगा, ताकि आगे कभी इनका उपयोग न हो सके।

स्वामी सानंद के संघर्ष का असर

इस पूरे मामले में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद, जिन्हें पहले जी.डी. अग्रवाल के नाम से जाना जाता था, की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए लंबा अनशन किया था। उनकी मांग थी कि गंगा को सुरंगों में कैद न किया जाए। उनके संघर्ष ने न केवल जनजागरूकता बढ़ाई, बल्कि सरकार पर भी नैतिक दबाव बनाया।

हिमालय की नाजुकता और लोगों की चिंता

स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों का कहना था कि हिमालयी क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना बेहद संवेदनशील है। भारी निर्माण कार्य भविष्य में आपदाओं को न्योता दे सकता है। धराली जैसी घटनाओं ने इन आशंकाओं को और मजबूत किया। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने यह स्वीकार किया कि बड़े प्रोजेक्ट्स से पहले पर्यावरणीय जोखिमों को गंभीरता से लेना जरूरी है।

आर्थिक नुकसान, लेकिन पर्यावरण को प्राथमिकता

करीब 2000 करोड़ रुपये की परियोजना को रद्द करना और अब 52 करोड़ खर्च कर सुरंगों को बंद करना निश्चित रूप से बड़ा आर्थिक नुकसान है। लेकिन इसके बावजूद यह फैसला इस बात की मिसाल बन गया है कि विकास के नाम पर प्रकृति से समझौता जरूरी नहीं। उत्तरकाशी में लिया गया यह निर्णय गंगा की अविरलता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

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