उत्तराखंड

उत्तराखंड में वन भूमि पर अतिक्रमण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से मांगी विस्तृत रिपोर्ट

The Supreme Court has taken a strict stance on encroachment on forest land in Uttarakhand and has sought a detailed report from the government.

नई दिल्ली/देहरादून। उत्तराखंड में वन भूमि पर हो रहे अवैध कब्जों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से वन क्षेत्रों में हुए अतिक्रमण और अवैध निर्माण को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। अदालत ने संकेत दिए हैं कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि संगठित तरीके से जमीन हड़पने और संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि वन भूमि की सुरक्षा राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन लंबे समय तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। अदालत ने हैरानी जताई कि जब जंगल की जमीन पर खुलेआम कब्जे हो रहे थे, तब संबंधित विभागों ने समय रहते हस्तक्षेप क्यों नहीं किया।

अतिक्रमण का पूरा ब्यौरा मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि राज्य सरकार एक विस्तृत साइट मैप के साथ यह जानकारी दे कि कितनी वन भूमि पर कब्जा हुआ है, किस तरह के निर्माण किए गए हैं और इसके पीछे किन लोगों या संस्थाओं की भूमिका रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आंकड़े पेश करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी बताना होगा कि जिम्मेदारी किसकी बनती है।

2866 एकड़ वन भूमि पर कब्जे का अनुमान

अदालत के समक्ष पेश प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड में अधिसूचित वन भूमि के लगभग 2866 एकड़ क्षेत्र पर निजी कब्जा होने का अनुमान है। यह आंकड़ा राज्य की पर्यावरणीय स्थिति और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने कहा कि वह यह जानना चाहती है कि इतनी बड़ी मात्रा में अतिक्रमण कैसे संभव हुआ।

ऋषिकेश का मामला बना चर्चा का केंद्र

सुनवाई के दौरान ऋषिकेश से जुड़ा एक मामला विशेष रूप से सामने आया। आरोप है कि वन भूमि का एक हिस्सा एक संस्था को पट्टे पर दिया गया, जिसके बाद उस जमीन को निजी भूखंडों में बांट दिया गया। बाद में आपसी विवाद को समझौते के जरिए सुलझा लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को संदेह की नजर से देखा और इसे संभावित मिलीभगत का उदाहरण बताया।

सरकार को चेतावनी, सख्ती के संकेत

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार और उसके अधिकारी मूक दर्शक बने रहे। कोर्ट ने यह भी संकेत दिए कि जरूरत पड़ी तो वह इस मामले में कार्रवाई के दायरे को और बढ़ा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वन भूमि के मामलों में किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

याचिका से सामने आया मामला

यह पूरा मामला एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर वन भूमि पर अवैध कब्जे हो रहे हैं। अदालत ने याचिका में उठाए गए मुद्दों को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है।

पर्यावरण पर गहरा असर

विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी राज्य में वन भूमि पर अतिक्रमण का सीधा असर पर्यावरण, जल स्रोतों और आपदा प्रबंधन पर पड़ता है। अब सबकी नजर राज्य सरकार की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी हुई है, जो इस पूरे मामले की दिशा तय करेगा।

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