पहाड़ की मुस्कान: होम-स्टे क्रांति ने उत्तराखंड के वीरान गांवों में फूँकी नई जान, पलायन पर लगा ब्रेक
The smile of the mountains: The homestay revolution has breathed new life into the deserted villages of Uttarakhand, putting a brake on migration.
देहरादून: उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी” यहां के काम नहीं आने की कहावत मशहूर थी। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। जिन गांवों में कभी ताले लटके घर और वीरान गलियां पलायन की मूक गवाह थीं, वहां अब पर्यटकों के ठहाके और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूँज सुनाई दे रही है। इस बड़े बदलाव का सूत्रधार बना है—‘होम-स्टे मॉडल’। विकास और विरासत के इस अनूठे संगम ने न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारा है, बल्कि प्रवासियों को वापस अपने जड़ों की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया है।
पलायन का दर्द और आत्मनिर्भरता की राह
दशकों से उत्तराखंड के सीमावर्ती और दूरस्थ गांव मूलभूत सुविधाओं के अभाव में खाली हो रहे थे। बेहतर भविष्य की तलाश में लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। लेकिन राज्य सरकार की ‘दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास योजना’ ने ग्रामीणों को एक नया नजरिया दिया। अपने पुश्तैनी घरों को होम-स्टे में बदलकर ग्रामीणों ने न केवल स्वरोजगार अपनाया, बल्कि ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा को व्यापारिक मजबूती भी दी।
संस्कृति का संरक्षण और पर्यटकों का आकर्षण
आज का आधुनिक पर्यटक कंक्रीट के होटलों से ऊबकर शांत वादियों और शुद्ध वातावरण की तलाश में है। उत्तराखंड के होम-स्टे उन्हें वह ‘घर जैसा अनुभव’ (Home away from home) दे रहे हैं जो बड़े रिसॉर्ट्स में नामुमकिन है।
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पारंपरिक खानपान: पर्यटकों को मडुआ की रोटी, झंगोरे की खीर और पहाड़ी रायता जैसे स्थानीय व्यंजन परोसे जा रहे हैं।
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लोक संस्कृति: पर्यटक अब केवल घूमते नहीं, बल्कि स्थानीय लोकगीतों, जागरी और पारंपरिक वेशभूषा का अनुभव भी ले रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण का नया अध्याय
इस होम-स्टे क्रांति की असली रीढ़ पहाड़ की महिलाएं हैं। टिहरी, पौड़ी और उत्तरकाशी जैसे जिलों में महिलाएं न केवल होम-स्टे का प्रबंधन कर रही हैं, बल्कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से स्थानीय हस्तशिल्प और जैविक उत्पादों की बिक्री भी कर रही हैं। इससे महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुई हैं और ग्रामीण समाज में उनका निर्णय लेने का स्तर भी बढ़ा है।
टिहरी: होम-स्टे का उभरता हुआ हब
टिहरी जिले ने इस क्षेत्र में एक मॉडल पेश किया है। टिहरी झील के आसपास के दर्जनों गांवों में होम-स्टे की संख्या में भारी उछाल आया है। अकेले कुछ चुनिंदा गांवों में ही 20 से अधिक पंजीकृत होम-स्टे संचालित हो रहे हैं, जो सीधे तौर पर सैकड़ों परिवारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार दे रहे हैं।
भविष्य की संभावना और सरकारी सहयोग
जून 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में पंजीकृत होम-स्टे की संख्या हजारों पार कर चुकी है। सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी, आसान ऋण और स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग ने इस क्षेत्र को और अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गति बनी रही, तो उत्तराखंड जल्द ही विश्व स्तर पर ‘रूरल टूरिज्म’ (Rural Tourism) का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।
होम-स्टे योजनाएं यह साबित कर रही हैं कि यदि विरासत को विकास के साथ जोड़ दिया जाए, तो पहाड़ों का पानी और जवानी दोनों यहीं सुरक्षित रह सकते हैं। आज उत्तराखंड के गांव फिर से जीवंत हो उठे हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि विकास की असली जड़ें मिट्टी से जुड़ी होनी चाहिए।



