उत्तराखंड

राज्य स्थापना दिवस से पहले भड़की नाराजगी, उत्तराखंड आंदोलनकारियों ने रजत जयंती समारोह के बहिष्कार का किया ऐलान

Anger erupts ahead of State Foundation Day; Uttarakhand activists announce boycott of silver jubilee celebrations.

देहरादून: उत्तराखंड के राज्य गठन की 25वीं वर्षगांठ (रजत जयंती) से ठीक पहले राज्य आंदोलनकारियों में असंतोष गहराता जा रहा है। चिन्हित राज्य आंदोलनकारी संयुक्त समिति ने सरकार की नीतियों और उदासीन रवैये के विरोध में आगामी राज्य स्थापना दिवस समारोहों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। समिति का आरोप है कि सरकार ने आंदोलनकारियों की मांगों पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है, जिससे उनमें गहरी नाराजगी है।


सरकार की नीतियों पर तीखा प्रहार

रामनगर में आयोजित समिति की बैठक में अध्यक्ष चंद्रशेखर जोशी और मुख्य संरक्षक धीरेंद्र प्रताप ने कहा कि सरकार ने राज्य निर्माण में योगदान देने वाले आंदोलनकारियों को भुला दिया है। धीरेंद्र प्रताप ने कहा, “राज्य आंदोलनकारियों के बिना उत्तराखंड का अस्तित्व नहीं होता। लेकिन आज वही आंदोलनकारी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आरक्षण, पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे बुनियादी मुद्दों पर कोई निर्णय नहीं ले रही। जबकि रजत जयंती समारोहों में करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। उनका कहना था कि सरकार की यह नीति आंदोलन की भावना और बलिदान का अपमान है।


48 घंटे का अल्टीमेटम, फिर राज्यव्यापी प्रदर्शन

बैठक में निर्णय लिया गया कि यदि 48 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो आंदोलनकारी राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे। समिति ने स्पष्ट किया कि यह विरोध केवल प्रतीकात्मक नहीं होगा, बल्कि जनता के बीच जाकर सरकार की नीतियों के खिलाफ अभियान चलाया जाएगा।

मुख्य संरक्षक धीरेंद्र प्रताप ने बताया कि आंदोलनकारियों ने सम्मान परिषद के अध्यक्ष सुभाष वर्थवाल को मध्यस्थ बनाकर सरकार से संवाद की पहल की है। लेकिन अगर परिणाम सकारात्मक नहीं निकला, तो रजत जयंती समारोहों का पूर्ण बहिष्कार किया जाएगा।


सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि राज्य में हाल के वर्षों में परीक्षा घोटाले, चारधाम यात्रा प्रबंधन की विफलता, और भ्रष्टाचार जैसे मामलों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है। समिति सदस्य प्रभात ध्यानी ने कहा, “हमने यह राज्य पारदर्शिता और जनहित के लिए बनाया था, लेकिन आज यह अपने मूल सिद्धांतों से भटक गया है।”

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री धामी ने कई बार आंदोलनकारियों के सम्मान की बात की, लेकिन जमीन पर कोई ठोस कदम दिखाई नहीं देता। समितियों की रिपोर्टें लागू नहीं की गईं और आंदोलनकारियों की फाइलें अब भी लंबित हैं।


“यह केवल बहिष्कार नहीं, सम्मान की लड़ाई है”

बैठक में मौजूद सुमित्रा बिष्ट, सुरेंद्र सिंह नेगी, मनोज गोस्वामी, अनिल अग्रवाल सहित अन्य वरिष्ठ आंदोलनकारियों ने कहा कि यह केवल कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं बल्कि सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि जब तक आंदोलनकारियों को उनका अधिकार और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक राज्योत्सव अधूरा रहेगा।


राजनीतिक और नैतिक चुनौती

राज्य आंदोलनकारियों का यह निर्णय सरकार के लिए राजनीतिक और नैतिक दोनों चुनौती बन गया है। यदि सरकार ने शीघ्र समाधान नहीं निकाला, तो यह असंतोष एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। आंदोलनकारियों ने कहा, “उत्तराखंड की रजत जयंती तभी सार्थक होगी, जब राज्य निर्माण में शामिल हर व्यक्ति को उसका हक और सम्मान मिलेगा।”

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