बेहद कम बारिश और बर्फबारी से उत्तराखंड में सूखे जैसे हालात, नदियों का जलस्तर गिरा और जंगलों में समय से पहले आग
Extremely low rainfall and snowfall have led to drought-like conditions in Uttarakhand, causing river levels to drop and premature forest fires.
उत्तराखंड में इस बार मौसम का मिजाज असामान्य बना हुआ है। सामान्य से बेहद कम बारिश और बर्फबारी के चलते राज्य में सूखे जैसे हालात बनने की आशंका गहराने लगी है। इसका असर केवल खेती और बागवानी तक सीमित नहीं है, बल्कि जल संसाधन, बिजली उत्पादन और वन संपदा पर भी गंभीर खतरा मंडराने लगा है। शीतकाल में ही जंगलों में आग की घटनाएं सामने आना इस बात का संकेत है कि आने वाला ग्रीष्मकाल राज्य के लिए और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कम वर्षा और हिमपात ने बढ़ाया जल संकट का खतरा
आमतौर पर उत्तराखंड में सर्दियों के दौरान अच्छी बारिश और ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी होती है, जो गर्मियों में नदियों और जलस्रोतों के लिए जीवनरेखा साबित होती है। ग्लेशियरों से पिघलने वाली बर्फ नदियों को पानी देती है और इससे पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन को सहारा मिलता है। लेकिन इस बार अपेक्षित हिमपात न होने से नदियों का जलस्तर लगातार गिरता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो गर्मियों में पानी की गंभीर किल्लत का सामना करना पड़ सकता है।
नदियों का घटता प्रवाह, बिजली उत्पादन पर सीधा असर
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा जल विद्युत परियोजनाओं पर निर्भर है। राज्य की अधिकांश बिजली परियोजनाएं नदियों के प्रवाह पर आधारित हैं। बारिश और बर्फबारी कम होने से नदियों में पानी घटने लगा है, जिसका सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ रहा है। उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डॉ. संदीप सिंघल के अनुसार, शीतकाल में आमतौर पर बिजली उत्पादन न्यूनतम स्तर पर रहता है, लेकिन इस बार बर्फबारी न होने से ग्रीष्मकाल को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 9 से 10 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हो रहा है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में गर्मियों में यह उत्पादन बढ़कर करीब 20 मिलियन यूनिट तक पहुंच जाता है। यदि जलस्तर में सुधार नहीं हुआ तो ऊर्जा संकट गहराने की आशंका है।
शीतकाल में ही सुलग रहे जंगल, वन विभाग अलर्ट
मौसम की शुष्कता का सबसे भयावह असर वन क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। आमतौर पर उत्तराखंड में जंगलों में आग का फायर सीजन 15 फरवरी के बाद शुरू होता है, जब तापमान बढ़ने लगता है। लेकिन इस बार दिसंबर और जनवरी में ही जंगलों में आग की घटनाएं सामने आने लगी हैं। बारिश न होने से जंगलों में नमी बेहद कम हो गई है और पतझड़ के मौसम में गिरी सूखी पत्तियां आग के लिए ईंधन का काम कर रही हैं।
आग की बढ़ती घटनाएं, वन संपदा को भारी नुकसान
इस शीतकाल में अब तक जंगलों में आग की कुल 34 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। इन घटनाओं में 16.39 हेक्टेयर वन एवं अन्य भूमि क्षेत्र प्रभावित हुआ है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, गढ़वाल क्षेत्र में सबसे अधिक 14 आग की घटनाएं सामने आईं, जिनमें करीब 4.4 हेक्टेयर वन क्षेत्र झुलस गया। वन्यजीव आरक्षित क्षेत्रों की स्थिति और भी गंभीर रही, जहां 20 आग की घटनाओं में 10.24 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट और 1.75 हेक्टेयर सिविल सोयम या वन पंचायत क्षेत्र प्रभावित हुआ। हालांकि कुमाऊं क्षेत्र में अभी तक आग की कोई घटना दर्ज नहीं की गई है, लेकिन हालात को देखते हुए वहां भी सतर्कता बढ़ा दी गई है।
वन विभाग की तैयारियां, फिर भी चुनौती बरकरार
प्रमुख मुख्य वन संरक्षक आर.के. मिश्र के अनुसार, वन विभाग जंगल की आग की रोकथाम और प्रबंधन के लिए पहले से कार्ययोजना तैयार कर रहा है। फायर सीजन शुरू होने से पहले ही संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, फायर लाइनों की सफाई और निगरानी तंत्र को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, मौसम का लगातार शुष्क बना रहना विभाग के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। यदि आने वाले दिनों में बारिश नहीं हुई तो आग की घटनाओं में और इजाफा हो सकता है।
खेती, पर्यावरण और जनजीवन पर व्यापक असर
कम बारिश और बर्फबारी का असर आने वाले समय में खेती और बागवानी पर भी पड़ने की आशंका है। सिंचाई के लिए पानी की कमी से फसलों को नुकसान हो सकता है। साथ ही जंगलों में आग से जैव विविधता, वन्यजीवों और पर्यावरण संतुलन को भी गंभीर क्षति पहुंच रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए यह स्थिति आजीविका और जीवन दोनों के लिए संकट पैदा कर सकती है।
ग्रीष्मकाल को लेकर बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फरवरी और मार्च में भी बारिश और हिमपात नहीं हुआ, तो उत्तराखंड को गर्मियों में बिजली, पानी और पर्यावरण के मोर्चे पर दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। सरकार और प्रशासन की ओर से हालात पर नजर रखी जा रही है, लेकिन बदलते मौसम के इस पैटर्न ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में जल संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन को और अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत होगी।



