होर्मुज के बाद अब बाब-अल-मंदेब पर खतरा! हूतियों की बढ़ती मौजूदगी से भारत की टेंशन क्यों बढ़ी?
After Hormuz, the threat now shifts to Bab-el-Mandeb! Why has India's anxiety increased due to the growing presence of the Houthis?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब दुनिया की ऊर्जा और समुद्री व्यापार व्यवस्था के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है। एक तरफ ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है, वहीं दूसरी ओर यमन के हूती लड़ाकों की बढ़ती गतिविधियों ने बाब-अल-मंदेब के आसपास चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि Bab al-Mandeb Crisis अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि भारत समेत कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए गंभीर आर्थिक चुनौती बन सकता है।
हालात की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 10 सितंबर को होर्मुज स्ट्रेट से सिर्फ सात जहाज गुजरने की जानकारी सामने आई, जबकि संघर्ष से पहले इस समुद्री मार्ग से प्रतिदिन करीब 125 वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही होती थी। अब यदि दूसरा महत्वपूर्ण रास्ता बाब-अल-मंदेब भी लंबे समय तक असुरक्षित हो जाता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पर बड़ा दबाव पड़ सकता है।
बाब-अल-मंदेब के करीब कैसे पहुंचे हूती?
यमन के हूती लड़ाकों ने हाल के दिनों में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। मोचा पोर्ट पर नियंत्रण के बाद धुबाब और पेरिम द्वीप तक उनकी गतिविधियों ने समुद्री सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के अनुसार, हूती लड़ाके बाब-अल-मंदेब से करीब 75 किलोमीटर की दूरी तक पहुंच चुके हैं।
पेरिम द्वीप की स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह बाब-अल-मंदेब के समुद्री मार्ग के बेहद करीब स्थित है। ऐसे में यहां किसी भी सैन्य गतिविधि या हमले का खतरा बढ़ने पर गुजरने वाले मालवाहक और तेल टैंकरों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। Bab al-Mandeb Crisis की सबसे बड़ी चिंता यही है कि यह रास्ता पहले से ही दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री कॉरिडोर में शामिल है।
बाब-अल-मंदेब दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है। करीब 32 किलोमीटर चौड़ा यह जलमार्ग एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसी रास्ते से जहाज लाल सागर में प्रवेश करते हैं और आगे मिस्र की स्वेज नहर के जरिए भूमध्य सागर तक पहुंचते हैं।
दुनिया के करीब 10 से 12 प्रतिशत व्यापार और लगभग 30 प्रतिशत कंटेनर ट्रैफिक इस समुद्री कॉरिडोर से गुजरता है। तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के लिए भी इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार, इस मार्ग से प्रतिदिन लाखों बैरल पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही हुई।
यही कारण है कि Bab al-Mandeb Crisis का असर केवल लाल सागर क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकता। इसका प्रभाव एशिया, यूरोप और खाड़ी देशों के व्यापारिक नेटवर्क तक पहुंच सकता है।
अगर होर्मुज और बाब-अल-मंदेब दोनों प्रभावित हुए तो क्या होगा?
दुनिया के सामने सबसे बड़ा खतरा यह है कि दो प्रमुख समुद्री रास्ते एक साथ लंबे समय तक प्रभावित हो जाएं। होर्मुज स्ट्रेट तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि बाब-अल-मंदेब एशिया और यूरोप के बीच तेल, कंटेनर और अन्य सामान की आवाजाही के लिए अहम रास्ता है।
अगर दोनों कॉरिडोर से सुरक्षित आवाजाही संभव नहीं रही तो जहाजों को स्वेज नहर के बजाय अफ्रीका के दक्षिणी छोर केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबी यात्रा करनी पड़ सकती है। इससे एक समुद्री यात्रा में लगभग 10 से 14 दिन अतिरिक्त लग सकते हैं।
लंबी दूरी का मतलब ज्यादा ईंधन, अधिक क्रू लागत, ऊंचा बीमा प्रीमियम और महंगा माल ढुलाई खर्च होगा। इसका असर अंततः उन कंपनियों और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है जो आयातित उत्पादों पर निर्भर हैं।
तेल बाजार में पहले ही दिखने लगा असर
समुद्री मार्गों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में दिखाई देने लगा है। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है और सप्लाई बाधित होने की आशंका ने बाजार में चिंता बढ़ा दी है।
यदि होर्मुज से तेल और गैस की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है और साथ ही Bab al-Mandeb Crisis भी गहराता है, तो ऊर्जा बाजार पर दोहरा दबाव पड़ सकता है। तेल टैंकरों के रूट बदलने से डिलीवरी में देरी और परिवहन लागत बढ़ सकती है।
तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए विशेष चिंता का विषय है। महंगा कच्चा तेल पेट्रोलियम उत्पादों की लागत बढ़ाने के साथ-साथ देश के आयात बिल और महंगाई पर भी दबाव डाल सकता है।
भारत के लिए खतरा क्यों ज्यादा बड़ा है?
भारत की अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार और आयातित ऊर्जा पर काफी निर्भर है। यूरोप के साथ भारत के बड़े हिस्से का माल व्यापार लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते होता है। इंजीनियरिंग उत्पाद, दवाएं, रसायन, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल और कई तैयार उत्पाद इसी समुद्री मार्ग से यूरोपीय बाजारों तक पहुंचते हैं।
यदि जहाजों को अफ्रीका के चारों ओर लंबा रास्ता लेना पड़ा, तो भारतीय निर्यातकों को अधिक समय और माल ढुलाई खर्च का सामना करना पड़ सकता है। इससे भारतीय सामान की अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा भी प्रभावित हो सकती है।
Bab al-Mandeb Crisis भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल निर्यात का मामला नहीं है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। कच्चा तेल, LNG और LPG की सप्लाई में किसी भी बड़ी बाधा का सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
यूरोप को डीजल सप्लाई करने में भी भारत की बड़ी भूमिका
मौजूदा संकट के बीच भारत यूरोप के लिए डीजल सप्लाई करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। हाल के महीनों में भारत से बड़ी मात्रा में रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद यूरोपीय बाजारों तक पहुंचे हैं।
ऐसे में बाब-अल-मंदेब में लंबी अवधि की रुकावट भारत के लिए दोहरी चुनौती बन सकती है। एक ओर भारत को ऊर्जा आयात में दिक्कत हो सकती है, वहीं दूसरी ओर उसके रिफाइंड फ्यूल और अन्य उत्पादों के निर्यात पर भी असर पड़ सकता है।
क्या बढ़ सकती है भारत में महंगाई?
अगर समुद्री रास्तों का संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंच सकता है। महंगा तेल, बढ़ी हुई शिपिंग लागत और आयातित सामान की कीमतों में तेजी महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है।
पेट्रोलियम उत्पादों से लेकर LPG और औद्योगिक कच्चे माल तक, कई क्षेत्रों की लागत प्रभावित हो सकती है। इसलिए Bab al-Mandeb Crisis को केवल समुद्री सुरक्षा संकट के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
होर्मुज तेल की सप्लाई के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि बाब-अल-मंदेब भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक सप्लाई चेन की अहम कड़ी है। यदि दोनों समुद्री रास्तों पर तनाव लंबे समय तक बना रहा, तो इसका असर तेल की कीमतों, शिपिंग, भारतीय निर्यात, ऊर्जा आयात और आखिरकार घरेलू महंगाई तक पहुंच सकता है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष इन रणनीतिक समुद्री मार्गों को कितने समय तक प्रभावित करता है।



