उत्तराखंड

Glacial Lake Outburst Flood: पिघलते ग्लेशियरों से बढ़ा खतरा, उत्तराखंड की 6 झीलें बनीं चिंता का कारण

Glacial Lake Outburst Flood: Rising threat from melting glaciers; 6 lakes in Uttarakhand become a cause for concern.

Glacial Lake Outburst Flood का खतरा उत्तराखंड में लगातार गहराता जा रहा है। हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों ने वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने से बनने वाली झीलों का आकार और जल भंडारण क्षमता तेजी से बढ़ रही है। यदि इनमें से किसी झील का प्राकृतिक अवरोध टूटता है, तो निचले इलाकों में अचानक विनाशकारी बाढ़ आ सकती है, जिसे Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह खतरा इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में आबादी, सड़कें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और पर्यटन गतिविधियां नदी घाटियों के आसपास केंद्रित हैं। ऐसे में किसी भी झील के टूटने का प्रभाव दूर-दूर तक देखा जा सकता है।

ग्लेशियर रिसेशन ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की चिंता

जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई प्रमुख ग्लेशियर तेजी से सिकुड़े हैं और उनके आगे नई झीलों का निर्माण हुआ है।

वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार, उत्तराखंड में कई ऐसी झीलें मौजूद हैं जिनका आकार लगातार बढ़ रहा है। इन झीलों में जमा पानी यदि अचानक बाहर निकलता है तो यह बड़े पैमाने पर तबाही ला सकता है। यही वजह है कि Glacial Lake Outburst Flood को भविष्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक चुनौतियों में से एक माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन झीलों की निगरानी और जोखिम प्रबंधन नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में पहाड़ी क्षेत्रों को गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है।

13 झीलें संवेदनशील, 6 को माना गया अतिसंवेदनशील

केंद्रीय जल आयोग द्वारा तैयार की गई एक विस्तृत सूची में उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इनमें से 6 झीलों को अत्यधिक संवेदनशील माना गया है।

इन झीलों का संबंध मुख्य रूप से विलंगना, अलकनंदा और गौरीगंगा नदी बेसिन से है। कुमाऊं क्षेत्र की कई झीलें भी विशेषज्ञों की निगरानी सूची में शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन झीलों में पानी की मात्रा और क्षेत्रफल में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जो संभावित खतरे का संकेत है।

यदि किसी कारण से इन झीलों का प्राकृतिक बांध टूटता है, तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है और कई गांवों, सड़कों तथा अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है।

426 ग्लेशियर झीलों का अध्ययन, चौंकाने वाले निष्कर्ष

हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में उत्तराखंड की 426 ग्लेशियर झीलों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में उन झीलों को शामिल किया गया जिनका क्षेत्रफल एक हजार वर्ग मीटर से अधिक था।

रिपोर्ट में पाया गया कि 25 झीलें संवेदनशील श्रेणी में आती हैं, जबकि 6 झीलों को अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। पिछले एक दशक के दौरान इन झीलों के क्षेत्रफल और जल मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव सामान्य नहीं है और इसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन तथा ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से है। यही कारण है कि Glacial Lake Outburst Flood की आशंका को गंभीरता से लिया जा रहा है।

आधुनिक तकनीक से होगी निगरानी

संभावित खतरे को देखते हुए उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA), राज्य आपदा प्रबंधन विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने संवेदनशील झीलों की निगरानी के लिए नई योजना तैयार की है।

इसके तहत झीलों के आसपास अत्याधुनिक उपकरण लगाए जाएंगे। इनमें ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, ऑटोमैटिक वॉटर लेवल रिकॉर्डर, हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे और भूकंपीय गतिविधियों की निगरानी करने वाले सेंसर शामिल होंगे।

इन उपकरणों की मदद से मौसम, वर्षा, बर्फबारी और जलस्तर में होने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखी जाएगी। यदि किसी झील में जलस्तर अचानक बढ़ता है या अन्य असामान्य गतिविधि दर्ज होती है, तो संबंधित एजेंसियों को तुरंत सूचना मिल सकेगी।

समय रहते मिलेगा अलर्ट

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित होने से Glacial Lake Outburst Flood जैसी घटनाओं से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

यदि किसी झील में खतरे के संकेत दिखाई देते हैं, तो कंट्रोल सेंटर के माध्यम से निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को तुरंत अलर्ट भेजा जा सकेगा। इससे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और राहत-बचाव कार्यों की तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा।

आपदा प्रबंधन एजेंसियां इस दिशा में तेजी से काम कर रही हैं ताकि भविष्य में किसी भी संभावित संकट का प्रभाव कम किया जा सके।

नेटवर्क और संचार व्यवस्था बनी चुनौती

हालांकि, विशेषज्ञों ने एक बड़ी चुनौती की ओर भी ध्यान दिलाया है। अधिकांश संवेदनशील झीलें समुद्र तल से हजारों मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं, जहां मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं सीमित हैं।

ऐसी परिस्थितियों में उपकरणों से प्राप्त डेटा को वास्तविक समय में कंट्रोल सेंटर तक पहुंचाना आसान नहीं होगा। यदि संचार व्यवस्था बाधित होती है, तो समय पर चेतावनी जारी करने में कठिनाई आ सकती है।

इसी कारण विशेषज्ञों का सुझाव है कि निगरानी प्रणाली के साथ-साथ संचार नेटवर्क को भी मजबूत किया जाए, ताकि आपदा संबंधी जानकारी बिना किसी बाधा के संबंधित एजेंसियों तक पहुंच सके।

जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत

उत्तराखंड में बढ़ता Glacial Lake Outburst Flood खतरा केवल एक स्थानीय समस्या नहीं बल्कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। हिमालयी क्षेत्र में हो रहे पर्यावरणीय बदलाव आने वाले वर्षों में जल संसाधनों, कृषि, पर्यटन और मानव जीवन पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक निगरानी, तकनीकी तैयारी और प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीति के माध्यम से संभावित जोखिमों को कम किया जा सकता है। फिलहाल राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों की नजर उन छह अतिसंवेदनशील झीलों पर है, जो भविष्य में उत्तराखंड के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

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