उत्तराखंड

उत्तराखंड में खेती संकट की ओर, 2025 के आंकड़ों ने बढ़ाई किसानों की चिंता

Agriculture in Uttarakhand is heading towards a crisis, the 2025 figures have increased farmers' concerns.

देहरादून: उत्तराखंड में साल 2025 खेती-किसानी के लिए उम्मीद से कहीं ज्यादा निराशाजनक साबित हुआ है। सरकारी आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि राज्य में कई प्रमुख फसलों के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। खासतौर पर गढ़वाल मंडल में कृषि की स्थिति ज्यादा चिंताजनक रही, जहां सीमित संसाधन, घटती कृषि भूमि और प्राकृतिक चुनौतियों ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

उत्पादन में गिरावट ने गहराया संकट

आंकड़ों के मुताबिक, बीते कुछ वर्षों में आलू, दाल, चावल जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में लगातार कमी देखी गई है। आलू का उत्पादन 2025 में भले ही 2024 से थोड़ा बेहतर रहा हो, लेकिन 2022 और 2023 की तुलना में इसमें बड़ी गिरावट सामने आई है। यही स्थिति दालों की भी रही, जहां तीन वर्षों में हजारों मीट्रिक टन उत्पादन घट गया। इसका सीधा असर किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।

गढ़वाल मंडल में हालात ज्यादा खराब

गढ़वाल क्षेत्र में नकदी फसलों जैसे आलू और अदरक का उत्पादन तेजी से घटा है। पर्वतीय इलाकों में खेती केवल आय का साधन नहीं बल्कि जीवनशैली का हिस्सा रही है, लेकिन बदलते मौसम, सिंचाई की कमी और जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों ने खेती को जोखिम भरा बना दिया है। कई किसान अब खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं।

गेहूं में राहत, चावल में फिर निराशा

जहां एक ओर गेहूं के उत्पादन में 2025 के दौरान बढ़ोतरी दर्ज की गई है, वहीं चावल के उत्पादन ने चिंता बढ़ा दी है। 2022 की तुलना में चावल का उत्पादन 2025 में काफी कम रहा, जो राज्य की खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर संकेत माना जा रहा है।

घटती कृषि भूमि सबसे बड़ी चुनौती

प्रदेश में खेती के सामने सबसे बड़ी समस्या तेजी से घटती कृषि भूमि है। बीते 25 वर्षों में उत्तराखंड में करीब 27 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि खत्म हो चुकी है। विकास कार्यों, शहरीकरण और कंक्रीट के विस्तार ने खेती की जमीन को लगातार कम किया है। इसके साथ ही सिंचाई सुविधाओं का अभाव भी हालात को और गंभीर बना रहा है।

जंगली जानवरों का बढ़ता खतरा

पहाड़ी इलाकों में बंदर और जंगली सूअर फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं, जबकि मैदानी क्षेत्रों में हाथियों का आतंक बढ़ता जा रहा है। पशुपालन भी अब सुरक्षित नहीं रहा, जिससे किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

भविष्य को लेकर बढ़ती चिंता

कृषि मंत्री का कहना है कि नई तकनीक और आधुनिक पद्धतियों से किसानों को जोड़ा जा रहा है और आने वाले समय में हालात सुधरेंगे। हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि ठोस कदम और प्रभावी योजनाओं के बिना खेती को बचा पाना मुश्किल होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते कृषि भूमि संरक्षण, सिंचाई विस्तार और किसानों को वास्तविक प्रोत्साहन नहीं मिला, तो उत्तराखंड में कृषि का भविष्य और भी संकट में पड़ सकता है।

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