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भारत में कट्टरपंथी सोच वाले मौलानाओं की वास्तविक सोच को उजाकर करता है “नसररुल्लाह की मौत का मातम”

यह लडाई बंद होनी चाहिए। इससे "बच्चो व महिलाओं" के साथ होती है मानवता प्रभावित

लेखक: अशोक बालियान (एडवोकेट)

इजराइल द्वारा आतंकवादी संगठन “हिजबुल्लाह” के चीफ हसन नसरल्लाह के मारने पर भारत के कुछ शिया मौलानाओं का उसको महिमामंडन करके मातम करना उचित नहीं है इजरायल ने 27 सितंबर को हिजबुल्लाह के बेरूत स्थित मुख्यालय पर हवाई हमला किया था और इसी हमले में हिजबुल्लाह चीफ हसन नसरल्लाह मारा गया था। अरब लीग के 22 मुस्लिम देश जुलाई 2024 तक हिजबुल्लाह को आतंकी संगठन ही मानते रहे हैं। अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, और गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल समेत 60 देशों ने हिजबुल्लाह को आतंकी संगठन घोषित किया है।ऐसे में एक आतंकी संगठन के प्रमुख हसन नसरुल्लाह के मारे जाने पर भारतीय शिया मुसलमानों के वर्ग का महिमामंडन करके मातम करना क्या साबित करता है।

हिजबुल्लाह के चीफ हसन नसरल्लाह की मौत के बाद, लखनऊ से लेकर कश्मीर तक, कुछ शिया मुस्लिम हाथों में पोस्टर और जुबान पर हसन नसरल्लाह नाम का नारा लिए घूम रहे हैं।यह प्रदर्शन कट्टरपंथी सोच वाले मौलानाओं की वास्तविक सोच को उजागर करता है।इस सोच से शिया वर्ग को लाभ के बजाय नुक़सान होगा।

     लेबनान को फ़्रांसीसी शासनादेश के तहत सन 1943 में आज़ादी मिली

इसके नए नेताओं ने राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत एक ऐसी सरकारी व्यवस्था बनाई गई थी, जो प्रमुख धार्मिक समूहों के बीच सत्ता का बंटवारा करती है। इस संधि के तहत, राजनीतिक शक्ति लेबनान के प्रमुख धार्मिक समूहों के बीच विभाजित था,जिसमे एक सुन्नी मुस्लिम प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करेगा, एक मैरोनाइट ईसाई राष्ट्रपति के रूप में, और एक शिया मुस्लिम संसद के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा। इन समूहों के बीच तनाव गृह युद्ध में बदल गया था, क्योंकि कई कारकों ने नाजुक संतुलन को बिगाड़ दिया था।

  हिजबुल्लाह का उदय लेबनान के गृहयुद्ध के दौरान हुआ

 सन 1975 में तब शुरू हुआ, जब देश में बड़ी संख्या में सशस्त्र फिलिस्तीनी उपस्थिति को लेकर लंबे समय से चल रहा असंतोष उबलने की स्थिति में पहुंच गया था।अरब राज्यों में अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर देखकर, ईरान और उसके इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने नवोदित मिलिशिया को धन और प्रशिक्षण प्रदान किया, जिसने हिजबुल्लाह नाम अपनाया, जिसका अर्थ “अल्लहा की पार्टी” है।

हिजबुल्लाह का नेतृत्व तीस साल से ज़्यादा समय तक हसन नसरल्लाह ने किया, जब तक कि सितंबर 2024 में इज़रायली हवाई हमले में उनकी मौत नहीं हो गई।हिजबुल्लाह लेबनान के शिया-बहुल क्षेत्रों पर नियंत्रण रखता है, जिसमें बेरूत, दक्षिणी लेबनान और पूर्वी बेका घाटी क्षेत्र के कुछ हिस्से शामिल हैं।

सन 1989 के ताइफ़ समझौते के तहत, जिसकी मध्यस्थता सऊदी अरब और सीरिया ने की थी और जिसने लेबनान के गृह युद्ध को समाप्त किया था, हिजबुल्लाह एकमात्र मिलिशिया था, जिसे अपने हथियार रखने की अनुमति थी।हिजबुल्लाह सन 1992 से लेबनानी सरकार का अभिन्न अंग रहा है, जब इसके आठ सदस्य संसद के लिए चुने गए थे।

 लेबनान में प्रति व्यक्ति शरणार्थियों की संख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा है

सन 1948 से पाँच लाख फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों और उनके वंशजों के अलावा, सीरिया में चल रहे सशस्त्र संघर्ष ने लगभग 1.5 मिलियन सीरियाई शरणार्थियों को जोड़ा है।

हिज़्बुल्लाह का अस्तित्व संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1559 का उल्लंघन करता है, जिसे सन 2004 में अपनाया गया था, जिसमें सभी लेबनानी मिलिशिया को भंग करने और निरस्त्र करने का आह्वान किया गया था। लेबनान में संयुक्त राष्ट्र बल (UNFIL), जिसे पहली बार 1978 में केंद्रीय सरकार के अधिकार को बहाल करने के लिए तैनात किया गया था, देश में बना हुआ है और इसके कार्य का एक हिस्सा हिज़्बुल्लाह को निरस्त्र करने का है।

बेरूत में अप्रैल 1983 में अमेरिकी दूतावास पर बमबारी की गई थी, जिसमें 63 लोग मारे गए थे।अक्टूबर में अमेरिकी और फ्रांसीसी सैनिकों के बैरकों पर आत्मघाती हमलों में 305 लोग मारे गए थे।अमेरिकी अदालत ने फैसला सुनाया था कि इन हमलों के पीछे हिजबुल्लाह का हाथ है।तभी से अमेरिकी नीति निर्माता हिजबुल्लाह को वैश्विक आतंकवादी खतरे के रूप में देखते हैं।

बिल क्लिंटन प्रशासन ने सन 1997 में हिजबुल्लाह को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया

 हसन नसरल्लाह सहित हिजबुल्लाह के कई सदस्यों को विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी ” करार दिया गया था। लेबनान में सन 2005 को वहां के उस समय के प्रधानमंत्री राफिक हरीरी की उनके आठ अंगरक्षकों के साथ हत्या कर दी गई थी और प्रधानमंत्री की हत्या की जांच में पता चला था कि हत्या में “हिजबुल्लाह” के वरिष्ठ सदस्य शामिल थे। लेबनानी सरकार ने सन 2008 में हिजबुल्लाह की सैन्य शक्ति को सीमित करने की कोशिश की थी, लेकिन गंभीर झड़पों के बाद भी लेबनानी प्रशासन हिजबुल्लाह को अलग-थलग करना या आतंकवादी संगठन घोषित नहीं कर पाया था।बेरूत में हिजबुल्लाह की हिंसक सैन्य कार्रवाई के परिणामस्वरूप बहुत लेबनानी नागरिक हताहत हुए थे।

हिजबुल्लाह ने सन 2009 के अपने घोषणापत्र में इजरायली राज्य के विनाश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।अक्टूबर 2023 में इजरायल पर हमास के हमले के बाद, गाजा पट्टी में स्थित ईरान समर्थित फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह “हिजबुल्लाह” ने इजरायल-लेबनान सीमा पर रॉकेट, मोर्टार और ड्रोन दागना शुरू कर दिया था।

 फोर्ब्स पत्रिका की सन 2018 की रिपोर्ट 

“हिजबुल्लाह” की अनुमानित वार्षिक आय 1.1 बिलियन डॉलर थी, जिसमें से लगभग 700 मिलियन डॉलर प्रति वर्ष ईरानी अधिकारियों द्वारा हस्तांतरित किया जाता था, और बाकी ड्रग्स और अपराध के एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से जुटाया जाता था।ईरान में सन 1979 की क्रांति के बाद, ईरान में सर्वोच्च नेता के अधिकार के तहत संचालित धर्मार्थ नींव की स्थापना की गई थी। इन निधियों की लेबनान में शाखाएँ हैं, जो “क्रांति के निर्यात” नीति के हिस्से के रूप में, हिज़्बुल्लाह को व्यापक वित्तीय और अन्य सहायता प्रदान करती हैं।

भारत में आतंकवादी संगठन के चीफ हसन नसरल्लाह की मौत के बाद कई संगठनों, राजनीतिक पार्टियों एवं अन्‍य लोगों का दुखी होना और विरोध स्‍वरूप सड़कों पर उतरना समझ नहीं आ रहा है! यदि इतने ही ये मानवाधिकार के संरक्षक हैं, तब फिर ये बांग्‍लादेश में हिन्‍दुओं पर हो रहे अत्‍याचारों पर चुप क्‍यों रहे?

हिजबुल्लाह एक आतंकवादी संगठन है, जो अपने उद्देश्यों और अपने मुख्य संरक्षक: ईरान और, कुछ हद तक, सीरिया के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए हिंसक साधनों और आतंकवाद का उपयोग करता है। इसलिए इजराइल द्वारा आतंकवादी संगठन “हिजबुल्लाह” के चीफ हसन नसरल्लाह के मारने पर भारत के कुछ शिया मौलानाओं का उसको महिमामंडन करके मातम करना उचित नहीं है।क्योंकि मौलानाओं के इस तरह के प्रदर्शन से शिया जनता आतंकवादी संगठन व राजनैतिक संगठन में अन्तर समझने में असमर्थ हो रही है। दुनिया के मुस्लिम समुदाय को यह सच जानना चाहिए ।

इज़राइल यहूदियों की 3 हज़ार वर्ष पहले से मातृ भूमि है।

इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच शुरु हुआ विवाद अब तेजी से जंग में तब्दील होता जा रहा है। इजराइल के यहूदियों व् फलस्तीन के मुस्लिमों के बीच विवाद की जड़ काफी पुरानी हैं। इज़राइल और फिलिस्तीन मूलरूप से यहूदियों की ही धरती है। इस ऐतिहासिक तथ्य से मुस्लिम जनता अनजान है, वह समझती है कि फ़िलिस्तीन मुस्लिमों की भूमि है। यहूदी मान्यता के अनुसार, अब्राहम की संतान की पीढ़ियों ने आगे चलकर यहूदी देश बनाया था, जिसका प्राचीन नाम लैंड ऑफ़ इज़रायल था।यहूदी धर्म दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक है। इस धर्म का इतिहास लगभग 3,000 वर्ष पुराना है। और लगभग 2200 साल पहले पहला यहूदी राज्य अस्तित्व में आया था।

     इज़रायल के राजा किंग सोलोमन ने करीब 1,000 ईसा पूर्व में यहां एक भव्य मंदिर बनवाया

एक समय बेबिलोनियन सभ्यता के लोगों ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था।पांच सदी बाद, 516 ईसा पूर्व में यहूदियों ने दोबारा इसी जगह पर एक और मंदिर बनाया, इसके बाद रोमन आये और सन् 70 में रोमन्स ने इसे तोड़ दिया था। इसप्रकार यहूदियों का यह धार्मिक स्थान बनता गया और टूटता गया था।

दूसरी तरफ मुस्लिमों की मान्यता के अनुसार सन् 621 के एक रात पैगंबर मुहम्मद साहब एक उड़ने वाले घोड़े पर बैठकर मक्का से जेरुसलम आए थे।सन् 632 में पैगंबर मुहम्मद साहब की मृत्यु हुई थी।और इसके चार साल बाद पैग़म्बर के उतराधिकारी अबू बक्र ने फ़िलिस्तीन पर हमले की योजना बनायी और सन् 636 में इस्लामिक हमलावरो ने सीरिया को जीतकर जेरुसलम पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया था।उस समय यहां बैजेन्टाइन साम्राज्य का शासन था।

 उम्मैयद खलीफ़ाओं ने जेरुसलम में अल अक्सा नाम से एक भव्य मस्जिद बनवाई 

ये दोनों इमारतें जेरुसलम में उसी आयताकार कंपाउंड के भीतर है, जिसे यहूदी अपने प्राचीन मंदिरों का स्थान मानते हैं।  जेरुसलम में एक तीसरा पक्ष ईसाई भी है और उनकी मान्यता के अनुसार ईसा मसीह ने इसी शहर में अपना उपदेश दिया था और उन्हें यहीं सूली पर चढ़ाया गया था। ईसाई ये भी मानते हैं कि एक रोज़ ईसा वापस दुनिया में लौटेंगे और उनकी इस सेकेंड कमिंग में जेरुसलम का अहम किरदार होगा।

The Land of Israel A Text-book on the Physical and by Robert Laird Stewart 1899 के पेज 1 के अनुसार फिलिस्तीन दक्षिणी सीरिया के उस हिस्से का परिचित नाम है, जिस पर स्थायी रूप से इज़राइल की जनजातियों का कब्ज़ा था। यह नाम, जैसा कि मूल रूप से बाइबिल और प्राचीन इतिहास में इस्तेमाल किया गया था, पलिश्तियों की भूमि तक सीमित था।

The Land of Israel A Text-book on the Physical and by Robert Laird Stewart

1899 के पेज 41 केअनुसार रोमन शासन के समय लेबनान के दक्षिण का पूरा देश तीन प्रांतों में विभाजित था, अर्थात: गलील, सामरिया और यहूदिया में विभाजित था।

Jerusalem the Holy A Brief History of Ancient Jerusalem by Edwin Sherman Wallace 1898 के पेज 334 के अनुसार सन् 636 में इस्लामिक हमलावरों के आक्रमण के बाद यरुशलम एक मुस्लिम शहर बन गया था। यदि यहूदियों ने इनकार किया,तो तलवार के फैसले का सहारा लिया।

इसके बाद इस्लामिक शासन ने वर्ष 999 में ईसाइयों और यहूदियों के पास इस्लाम अपनाने या अपनी सारी संपत्ति खोने का विकल्प दिया था, और जो लोग बाद वाला विकल्प चुनते थे, उन्हें अक्सर हिंसक मौत का सामना करना पड़ता था।

 सन 1099 में ईसाइयों और मुस्लिमों में इस भूमि को लेकर धर्मयुद्ध शुरू हुआ

 इस फर्स्ट क्रूसेड के तहत ईसाइयों ने जेरुसलम को जीत लिया था, लेकिन सन 1187 में मुस्लिमों ने जेरुसलम पर पुन: कब्जा कर लिया था। इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध से पहले फिलिस्तीन पर ऑटोमन साम्राज्य का कब्जा था, लेकिन युद्ध में उसकी हार के बाद यह क्षेत्र ब्रिटेन के कब्जे में आ गया था।

यहूदी पूरे यूरोप में बिखरे हुए थे।ब्रिटेन ने यहां यहूदी लोगों को उनके देश में पुन: बसाना शुरू कर दिया था, जो सदियों से अपने देश से बेदखल कर दिए थे।द्वितीय विश्व युद्ध में भी हिटलर के शासन के अंतर्गत पूरे यूरोप में भयंकर स्तर पर यहूदियों का नरसंहार हुआ था।

इजराइल और फलस्तीन के बीच टकराव की शुरुआत यहूदियों व अरब जगत के लोगों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना के संघर्ष से हुई थी।सन 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फलस्तीन को दो हिस्सों में बांटा, जिसमे यहूदियों के लिए इजराइल और अरब जगत के लोगों के लिए फलस्तीन देश बना था।

इस फैसले को इजरायल ने स्वीकार कर लिया था लेकिन फिलिस्तीन ने इस फैसले को स्वीकार नही किया था और इस्राइल के पड़ोसी देशों (इजिप्ट, सीरिया, इराक और जॉर्डन) ने उस पर हमला बोल दिया था। इस युद्ध में इस्राइल ने अपना बचाव करते हुए इन चारों देशों को हरा दिया था।

इसके बाद सन् 1967 में एक बार फिर इन देशों ने इजरायल पर हमला किया,लेकिन इजरायल ने छह दिन में ही उन्हें हरा दिया था और वेस्ट बैंक, गाजा और पूर्वी जेरूसलम पर कब्जा कर लिया था।

  वेस्ट बैंक और पूर्वी जेरूसलम पर इजरायल का कब्जा है,

 गाजा के कुछ हिस्से को उसने लौटा दिया है।ज्यादातर फिलिस्तीनी गाजा और वेस्ट बैंक में रहते हैं। पिछले कुछ समय से फिलिस्तीनियों में पूर्वी जेरूसलम से कुछ फिलिस्तीनी परिवारों को बेदखल किए जाने को लेकर रोष पनप रहा था। इसी के चलते फिलिस्तीन का चरमपंथी संगठन हमास गाजा पट्टी से इस्राइल पर खतरनाक रॉकेटों से हमले करता रहता है। हमास चार्टर एक यहूदी विरोधी दस्तावेज है,जो पूरी तरह से उनके धर्म के आधार पर यहूदियों की हत्या का समर्थन करता है।

10 मई 2021 को इज़रायल के लोग ‘जरुसलम डे’ मना रहे थे,इस दिन इज़रायल के लोगों पर फिलिस्तीनी लोगों ने पत्थरबाज़ी कर दी थीं। इसके बाद इज़रायली फोर्स मस्ज़िद कंपाउंड में घुस गई और इज़रायली फोर्सेज़ ने अल-अक्सा को खाली करवाकर उसके दरवाज़े बंद करवा दिए थे।

इसके बाद हमास ने इज़रायल पर रॉकेट दागनें शुरू कर दिए थे और जवाबी प्रतिक्रिया में इज़रायल ने फिलिस्तीनी इलाकों पर हवाई हमले शुरू कर दिए थे।इस लड़ाई से गाजा की मुस्लिम आबादी काफ़ी प्रभावित हुई थी।  इसके बाद 7 अक्तूबर 2023 को इज़राइल पर हमास हमलों के दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार, यौन हिंसा और क्षत-विक्षत करने के साक्ष्य दुनिया ने देखे और सुने हैं।हमले के दिन हमास द्वारा फिल्माए गए नग्न और खून से लथपथ महिलाओं के वीडियो, तथा बाद में घटनास्थल पर लिए गए शवों के फोटोग्राफों से पता चलता है कि हमलावरों ने महिलाओं को यौन निशाना बनाया था।

इज़राइल की निर्दोष जनता, जिनमे महिलायें व बच्चे भी है, उनको हमास ने 7 अक्तूबर को बंधक बना लिया था, जिनमें से अभी तक भी काफ़ी बंधक हमास के क़ब्ज़े में है।क्या इज़राइल को उन्हें छुड़ाने के लिए मिल्ट्री ऑपरेशन करने का अधिकार नहीं। ईरान को हमास द्वारा बंधक बनाये गये इज़राइल नागरिकों को छुड़ाने के लिए पहल करनी चाहिए थीं, क्योंकि वह हमास को सहायता व हथियार दे रहा है।लेकिन ईरान ने इज़राइल में आतंकवादी घटना होने के बाद भी इन आतंकवादी संगठनों को समर्थन देना जारी रखा है।

   हमास की बच्चों में महिलाओं के बर्बाता 

हमास द्वारा फिल्माए गए वीडियो में एक महिला को हथकड़ी लगाए और बंधक बनाए जाने का दृश्य शामिल है, जिसके हाथों पर कट लगे हैं तथा उसकी पतलून की सीट पर खून के बड़े धब्बे हैं।हमास की इस कार्यवाही का हिज़बुल्लाह व हूती ने समर्थन किया था।ईरान में एक चुनी हुई सरकार है, लेकिन उसका इन आतंकवादियों को समर्थन करना समझ से परे है। इज़राइल द्वारा हमास व हिज़बुल्लाह के चीफ़ को मारने का उसके पास वैध कारण है, क्योंकि ये आतंकवादी संगठन है और इज़राइल में हिंसक घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है। गाजा में हमास के आतंकवादियों को ख़त्म करने के लिए व लेबनान में हिज़बुल्लाह के आतंकवादियों को ख़त्म करने के लिए ही इज़राइल मिलिट्री ऑपरेशन चला रहा है।ईरान को आतंकवादी संगठनों का समर्थन नहीं करना चाहिए।

दुनिया के मुस्लिम समुदाय को समझना चाहिए कि हमास, हिज़बुल्लाह व हूती आतंकवादी संगठन है,जो हिंसा में विश्वास रखते है। इस लड़ाई में दोनों तरफ आम लोगों को जान और माल का नुकसान हो रहा है, जो दुखद है।यह लडाई बंद होनी चाहिए।इससे बच्चो व् महिलाओं के साथ मानवता प्रभावित होती है। महिलाओं के वीडियो, तथा बाद में घटनास्थल पर लिए गए शवों के फोटोग्राफों से पता चलता है कि हमलावरों ने महिलाओं को यौन निशाना बनाया था। इज़राइल की निर्दोष जनता, जिनमे महिलायें व बच्चे भी है, उनको हमास ने 7 अक्तूबर को बंधक बना लिया था, जिनमें से अभी तक भी काफ़ी बंधक हमास के क़ब्ज़े में है।क्या इज़राइल को उन्हें छुड़ाने के लिए मिल्ट्री ऑपरेशन करने का अधिकार नहीं।

ईरान को हमास द्वारा बंधक बनाये गये इज़राइल नागरिकों को छुड़ाने के लिए पहल करनी चाहिए थीं, क्योंकि वह हमास को सहायता व हथियार दे रहा है।लेकिन ईरान ने इज़राइल में आतंकवादी घटना होने के बाद भी इन आतंकवादी संगठनों को समर्थन देना जारी रखा है। हमास द्वारा फिल्माए गए वीडियो में एक महिला को हथकड़ी लगाए और बंधक बनाए जाने का दृश्य शामिल है, जिसके हाथों पर कट लगे हैं तथा उसकी पतलून की सीट पर खून के बड़े धब्बे हैं।हमास की इस कार्यवाही का हिज़बुल्लाह व हूती ने समर्थन किया था।

ईरान का एक चुनी हुई सरकार व आतंकवादियों को समर्थन करना समझ से परे है

    इज़राइल द्वारा हमास व हिज़बुल्लाह के चीफ़ को मारने का उसके पास वैध कारण है, क्योंकि ये आतंकवादी संगठन है और इज़राइल में हिंसक घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है। गाजा में हमास के आतंकवादियों को ख़त्म करने के लिए व लेबनान में हिज़बुल्लाह के आतंकवादियों को ख़त्म करने के लिए ही इज़राइल मिलिट्री ऑपरेशन चला रहा है।ईरान को आतंकवादी संगठनों का समर्थन नहीं करना चाहिए। दुनिया के मुस्लिम समुदाय को समझना चाहिए कि हमास, हिज़बुल्लाह व हूती आतंकवादी संगठन है,जो हिंसा में विश्वास रखते है। इस लड़ाई में दोनों तरफ आम लोगों को जान और माल का नुकसान हो रहा है, जो दुखद है। यह लडाई बंद होनी चाहिए।इससे बच्चो व् महिलाओं के साथ मानवता प्रभावित होती है।

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